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अन्तर्वासी पीढ़ी (इंडोर जनरेशन)

theindoorgenerationcomIndoor Generation

 

In one sixty seconds, you will decide how the indoor generation is.

 

This is all about us- the indoor generation, a generation that spends 90% of its life in doors.

 

It all started the day we left Nature behind.

 

We filled our homes with lovely things and all the stuff we wanted.

 

Our homes became places you would never want to leave.

 

Artificial light replaced daylight and we built our houses so that nothing could escape.

 

We cooked and showered, breathed and played, slept and sweated.

 

But we have closed ourselves in to a point where nothing could get out.

 

So when the air turned bad inside, we tried fixing it with chemicals and we put in little artificial suns everywhere to make the darkness bearable.

 

That is when things started to happen.

 

Hard to notice in the beginning.

 

Some needed help to sleep, to breathe, to not itch.

 

Many of us even started to feel sad.

 

So we turned on happy lamps to make sadness go away.

 

The scientists discovered that the air inside our homes is up to five times more polluted that the air outside.

 

And that the lack of daylight can affect children's learning and increase blood pressures.

 

It turns out that kids’ rooms often have the highest concentration of toxicants in the house.

 

In fact, millions of homes are unhealthy to live in.

 

They discovered that living in damp and muddy homes increases the risk of asthma by 40%.

 

And I learnt that millions of people like me suffer from asthma and allergies caused by a bad indoor environment.

 

And so here we are

 

How this story ends is up to you because it's not written yet,

 

If you care about the indoor generation, do something, begin to think and live differently.

 

Let light and fresh air into your life again!

 

Even small changes can make a huge difference for coming generations.

 

Learn how @ theindoorgeneration.com


अन्तर्वासी  पीढ़ी (इंडोर जनरेशन)

 

एक सौ साठ सेकंड्स में, आप तय करेंगे कि इनडोर पीढ़ी कैसी है।

 

यह सब हमारे बारे में है- इनडोर जनरेशन, एक ऐसी पीढ़ी जो अपने जीवन का 90% समय दरवाजों के भीतर बिताती है।

 

यह सब शुरू हुआ जिस दिन हमने नेचर को पीछे छोड़ दिया।

 

हमने अपने घरों को प्यारी चीजों से भर दिया और उन सभी सामानों से भर दिया जो हम चाहते थे।

 

हमारे घर ऐसे स्थान बन गए, जिन्हें आप कभी नहीं छोड़ना चाहेंगे।

 

कृत्रिम प्रकाश ने दिन के उजाले की जगह ले ली।

 

और हमने अपने घरों का इस प्रकार से निर्माण किया कि कुछ भी न छूट सके: हम खाना बनाते और नहाते, सांस लेते और खेलते, सोते और पसीना बहाते।

 

लेकिन, हमने खुद को इस हद तक बंद कर रखा है कि जहां से कुछ भी बाहर न जा सके।

 

इसलिए जब हवा भीतर (अन्तर्वास में) दूषित हो गई, तो हमने इसे रसायनों से ठीक करने की कोशिश की।

 

और हमने अंधेरे को सहने योग्य बनाने के लिए हर जगह थोड़ा कृत्रिम सूरज उगा दिए।

 

तभी ऐसा होने लगा।

 

शुरुआत में नोटिस करना मुश्किल है।

 

किसी को नींद के लिए, किसी को सांस लेने के लिए, किसी को खुजली रोकने के लिए मदद की आवश्यकता थी।

 

हममें से कई लोग दुखी भी होने लगे।

 

इसलिए हमने दुख को दूर करने के लिए हैप्पी लैंपों को चालू किया।

 

वैज्ञानिकों ने पता लगाया कि हमारे घरों के अंदर की हवा बाहर की हवा से पांच गुना अधिक प्रदूषित है।

 

और यह कि दिन के उजाले की कमी से बच्चों की सीखने की प्रक्रिया (लर्निंग) प्रभावित हो सकती है और लोगों का रक्तचाप बढ़ा सकती है।

 

यह पता चला है कि घर में बच्चों के कमरे में अक्सर सबसे अधिक विषैले पदार्थ होते हैं।

 

वास्तव में, लाखों घर रहने के लिए अस्वास्थ्यकर हैं।

 

उन्होंने पता लगाया कि नम और गंदले घरों में रहने से अस्थमा का खतरा 40% बढ़ जाता है।

 

और मुझे पता चला कि मेरे जैसे लाखों लोग एक खराब इनडोर वातावरण के कारण अस्थमा और एलर्जी से पीड़ित हैं।

 

और हम भी यहां आ गए।

 

यह कहानी कैसे समाप्त हो, यह आप पर निर्भर है, क्योंकि यह कहानी अभी तक लिखी नहीं गयी है,

 

यदि आप इनडोर पीढ़ी की परवाह करते हैं, तो कुछ करें, सोचना शुरू करें और अलग ढंग से जीवन जियें।

 

अपने जीवन में फिर से प्रकाश और ताजा हवा आने दें!

 

यहां तक ​​कि छोटे बदलाव आने वाली पीढ़ियों के लिए बहुत बड़ा बदलाव ला सकते हैं।

 

जानिए कैसेtheindoorgeneration.com

 


Translation from English into Hindi by Prof. (Dr) Abnish Singh Chauhan

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