ISSN 2277 260X   

 

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Sunday, 19. August 2018 - 19:51 Uhr

बदरा आए - अवनीश सिंह चौहान


abnish-singh-may-2017धरती पर है धुंध

गगन में
घिर-घिर बदरा आए

 

लगे इन्द्र की पूजा करने
नम्बर दो के जल से
पाप-बोध से भरी
धरा पर
बदरा क्योंकर बरसे

 

कृपा-वृष्टि हो
बेकसूर पर
हाँफ रहे चैपाए

 

हुए दिगम्बर पेड़, परिन्दे-
हैं कोटर में दुबके
नंगे पाँव
फँसा भुलभुल में
छोटा बच्चा सुबके

 

धुन कजरी की
और सुहागिन का
टोना फल जाए

 

सूखा औ’ महँगाई दोनों
मिलते बाँध मुरैठे
दबे माल को
बनिक निकाले
दुगना-तिगुना ऐंठे

 

डूबें जल में
खेत, हरित हों
खुरपी काम कमाए


 


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Friday, 20. July 2018 - 12:45 Uhr

अवनीश सिंह चौहान को दिनेश सिंह स्मृति सम्मान


abnish2-2लालगंज (रायबरेली): रविवार: 15 जुलाई 2018: बैसवारा इंटर कालेज के सभागार में कव्यालोक साहित्यिक एवं सांस्कृतिक संस्था ने​ ​​'डॉ  शिवबहादुर सिंह भदौरिया की जयंती सम्मान समारोह'​ ​का भव्य आयोजन किया, जिसमें ​युवा नवगीतकार, आलोचक एवं सम्पादक डॉ अवनीश सिंह चौहान को स्मृतिपत्र​ ​समेत अंगवस्त्र एवं मोमेंटो देक
​र​ 'दिनेश सिंह स्मृति सम्मान'​ ​से अलंकृत किया गया। यह सम्मान सुप्रतिष्ठित नवगीतकार, आलोचक एवं सम्पादक स्व दिनेश सिंह की स्मृति में प्रति वर्ष एक नवगीतकार को दिया जाता है।
 
पेशे से प्राध्यापक (अंग्रेजी)
​एवं ​
बहुआयामी रचनाकार डॉ अवनीश सिंह चौहान चौहान के नवगीत 'शब्दायन', 'गीत वसुधा', 'सहयात्री समय के', 'समकालीन गीत कोश', 'नयी सदी के गीत', 'गीत प्रसंग' आदि समवेत संकलनों में संकलित हो चुके हैं, जबकि आपकी तमाम रचनाएँ देश-विदेश के पत्र-पत्रिकाओं में प्रकाशित हो चुकी हैं। आपके द्वारा सृजित आधा दर्जन से अधिक अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों में पिछले 14 वर्षों से पढ़ी-पढाई जा रही हैं। हिन्दी भाषा में 2013 में प्रकाशित आपका गीत संग्रह 'टुकड़ा कागज़ का' काफी चर्चित हो चुका है। आपने 'बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता' पुस्तक का संपादन किया है। आप वेब पत्रिका 'पूर्वाभास' और 'क्रिएशन एवं क्रिटिसिज़्म' (अँग्रेज़ी) के सम्पादक हैं। आपको 'अंतर्राष्ट्रीय कविता कोश सम्मान', मिशीगन- अमेरिका से 'बुक ऑफ़ द ईयर अवार्ड', राष्ट्रीय समाचार पत्र 'राजस्थान पत्रिका' का 'सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार', अभिव्यक्ति विश्वम् (अभिव्यक्ति एवं अनुभूति वेब पत्रिकाएं) का 'नवांकुर पुरस्कार', उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान-लखनऊ का 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' आदि से अलंकृत किया जा चुका है।

कार्यक्रम में मौजूद श्रद्धेय स्वामी भाष्करस्वरूप जी महाराज, संस्था के अध्यक्ष प्रतिष्ठित शिक्षाविद डॉ महादेव सिंह, संस्था के महामंत्री
​चर्चित साहित्यकार डॉ विनय भदौरिया आदि ने सुप्रसिद्ध नवगीतकार डॉ शिव बहादुर सिंह भदौरिया जी के व्यक्तित्व एवं कृतित्व पर प्रकाश डाला और उनकी पावन स्मृतियों को श्रद्धापूर्वक नमन किया। वरिष्ठ लेखक-पत्रकार श्री नरेंद्र भदौरिया ने कहा कि स्व भदौरिया जी का साहित्यिक अवदान श्लाघनीय है; शायद तभी उनके गीत सुनकर आज भी ऐसा लगता है जैसे कोई हमारे दिल की बात कह रहा हो। प्रधानाचार्य रामप्रताप सिंह ने कहा कि डॉ भदौरिया की कविताओं में आक्रोश भी बड़े सहज ढंग से प्रस्तुत हुआ है; यह  कविताओं के माध्यम से उनके कहने का सलीका और साहस ही था कि उन्होंने लिखा कि 'ना काबिल पैताने के, बैठे हैं सिरहाने लोग। डॉ अवनीश सिंह चौहान ने जाने-माने नवगीतकार एवं नये-पुराने पत्रिका के यशस्वी संपादक स्व दिनेश सिंह​ ​से​ ​जुड़े​ ​कुछ रोचक संस्मरणों को श्रोताओं के समक्ष प्रस्तुत करते हुए कहा कि श्रद्धेय डॉ शिव बहादुर सिंह भदौरिया जी दिनेश सिंह जी के गुरुदेव रहे हैं और इस नाते वह मेरे दादा गुरु हुए।​ ​
 
इस पावन अवसर पर देशभर से पधारे अन्य साहित्यकार- श्रद्धेय श्री ओमप्रकाश अवस्थी, श्री नचिकेता, श्री रामनारायण रमण, श्री देवेन्द्र पाण्डेय देवन, श्री हरिनाम सिंह, श्री शीलेंद्र कुमार सिंह चौहान, श्री विनोद श्रीवास्तव एवं श्री सतीश कुमार सिंह को भी सम्मानित किया गया। कार्यक्रम में सर्वश्री इंद्रेश सिंह भदौरिया, रमाकांत, राजेश सिंह फौजी, डॉ निरंजन राय, मनोज पांडेय, विश्वास बहादुर सिंह, चंद्रप्रकाश पांडेय, वासुदेव सिंह गौढ़ आदि प्रमुख रूप से मौजूद रहे। कार्यक्रम का बेहतरीन संचालन शिक्षक नेता आशीष सिंह सेंगर ने किया और शिक्षाविद डॉ महादेव सिंह ने आभार व्यक्त किया।
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Thursday, 12. April 2018 - 15:04 Uhr

टुकड़ा कागज़ का के बहाने


अवनीश सिंह चौहान का नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' पढ़ते हुए मुझे श्रीप्रकाश मिश्र की बात याद आई, इसे पढ़कर लगा कि इसमें संग्रहीत जो गीत हैं वे समकालीन हिन्दी कविता के कथ्य और तथ्य से बहुत गहरे जुड़ते नजर आते हैं। इन गीतों में न तो कोरी भावुकता है न कोरी बौद्धिकता, जिस तरह निराला के बाद की कविता की चर्चा करते वक्त हम अज्ञेय, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, शमशेर, धर्मवीर भारती, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, धूमिल वगैरह का नाम धड़ाधड़ लेते जाते हैं वैसे गीतकारों की कोई श्रंखला नहीं बन पाती, किन्तु दिनेश सिंह, वीरेंद्र आस्तिक, बुद्धिनाथ मिश्र, कुँवर बेचैन, कैलाश गौतम, यश मालवीय, सुधांशु उपाध्याय आदि की एक अलग परम्परा जरूर दिखाई पड़ती है जिसने गीत-नवगीत को समकालीन कविता जैसी चुनौतियों के समकक्ष खुद को उभारा। … समकालीन हिन्दी नवगीत विधा में अवनीश सिंह चौहान का यह संग्रह और इसमें संग्रहीत गीत एक उपलब्धि और योगदान के रूप में जाने जायेंगे। 


- श्री रंग, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक, इलाहाबाद, उ. प्र.


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Tuesday, 10. April 2018 - 11:48 Uhr

अवनीश सिंह चौहान के एसोसियट प्रोफेसर न बनने पर खेद - डॉ पूर्णमल गौड़


डॉ अवनीश सिंह चौहान को डॉ पूर्णमल गौड़ की चिठ्ठी 


ab-singh---copy-1प्रिय अवनीश जी,
आप जैसे योग्य, सुशिक्षित, अनुभवी, उत्कृष्ट लेखक, शोधकर्मी, आदर्श शिक्षक, विश्वविद्यालय के गौरव को  बढाने में सदैव तत्पर, बेहद ईमानदार, छात्र हितैषी, बहुआयामी व्यक्तित्व, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनारों में सहभागिता व अध्यक्षता करने वाले प्राध्यापक को पदोन्नत कर एसोसियट प्रोफेसर बहुत पहले बना देना चाहिए था; अब तक नहीं बनाये जाने के लिए खेद है। मेरी अनन्त मंगल कामनाएं।

आपका,
डॉ पूर्णमल गौड़
सलाहकार, पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं डॉ मंगलसेन चेयर्स
महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक, हरियाणा

(डॉ पूर्णमल गौड़ महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय एवं एसआरएम विश्वविद्यालय, सोनीपत में हिन्दी विभागाध्यक्ष रह चुके हैं )

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Wednesday, 28. March 2018 - 12:26 Uhr

जो करना है अभी करना है - डॉ अवनीश सिंह चौहान


pramod-prakharयदि "हिंदी साहित्‍य के हजारों वर्षों के इतिहास में," जैसा कि हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने कहा है, "कबीर जैसा व्‍यक्तित्‍व लेकर कोई लेखक उत्‍पन्‍न नहीं हुआ," तो समकालीन हिन्दी गीत के इतिहास में भी दिनेश सिंह (रायबरेली) जैसा कवि एवं आलोचक विरले ही दिखाई पड़ता है। कबीर के कवित्‍व के प्रति आज का साहित्य समाज गाहे-बगाहे आश्‍वस्‍त दिखाई पड़ता है, किन्तु दिनेश सिंह के साथ यह स्थिति अब तक नहीं बन पायी है। क्या 'समय' रायबरेली के साहित्यकारों की परीक्षा ले रहा है? कहना भले ही मुश्किल हो, किन्तु 'डलमऊ और निराला' पुस्तक में रामनारायण रमण जी ने महाप्राण निराला के बारे में कुछ इसी तरह से लिखा है। लेकिन रमण जी यह भी मानते हैं कि अच्छा रचनाकार अपनी प्रतिभा, अपने सृजन पर भरोसा रखते हुए सदैव आश्वस्त रहता है कि - 'हम न मरिहैं, मरिहै संसारा' (कबीर) और 'मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,/ इसमें कहाँ मृत्यु?/ है जीवन ही जीवन/ अभी पड़ा है आगे सारा यौवन/ स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,/ मेरे ही अविकसित राग से/ विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;/ अभी न होगा मेरा अन्त' (निराला)। कबीर की शैली में निराला का 'अभी' शब्द क्या यहाँ 'कभी' का अर्थ नहीं देता है?
 
यदि ऐसा है तो रायबरेली के रचनाकारों का सम्यक मूल्यांकन 'समय रहते' होना चाहिए। सम्यक मूल्यांकन होने से जहाँ सार्थक और प्रतिभाशाली रचनाकारों की परख हो सकेगी, वहीं पता चल सकेगा कि किस रचना (कृति) को क्या स्थान दिया जाना चाहिए। इसी क्रम में रायबरेली से प्रमोद प्रखर जी की पाण्डुलिपि को पढ़ने का अवसर मिला। शीर्षक है - 'अभी समय है।' अद्भुत शीर्षक, जिसमें चेतावनी का संकेत भी है और मित्रवत सलाह भी। 'समय' एक गतिमान सत्ता है, जिसके तीन रूपों (भूतकाल, वर्तमान और भविष्य) में सर्वाधिक गतिशील वर्तमान ही कहा जा सकता है। शायद इसीलिये इस शीर्षक में प्रयुक्त शब्द - 'अभी' समयरेखा पर एक बिंदु के रूप में वर्तमान की सशक्त उपस्थिति का अहसास कराता है। सन्देश यह कि जो करना है 'अभी' करना है। यानी कि अभी नहीं तो कभी नहीं। इस शीर्षक को देखकर बंगाली कवि हरजिन्दर सिंह लाल्टू याद आ गए:- 
 
अभी समय है
कुछ नहीं मिलता कविता बेचकर
कविता में कुछ कहना पाखंड है
फिर भी करें एक कोशिश और
दुनिया को ज़रा और बेहतर बनाएँ।  
 
लाल्टू की तरह प्रखर जी भी दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिश पिछले पैंतीस वर्षों से कर रहे हैं, जिसका प्रमाण उनके द्वारा रचित / सम्पादित लगभग एक दर्जन पुस्तकें हैं। यह कोई आसान काम नहीं, वह भी तब जब रचनाकार साहित्य की कई विधाओं में कार्य कर रहा हो। इन तमाम विधाओं में प्रखर जी की सबसे प्रिय विधा कविता ही रही है। शायद इसीलिये परोपकार की भावना से लैस, स्वभाव से विनम्र और व्यवहार में समभाव रखने वाले प्रखर जी कविता को जीवन का पर्याय मानते हैं:-
 
हमारे गीत 
तुम्हारे मन 
जगह अपनी बना लें तो 
हमें आशीष दे देना। 
 
ये कविता है मेरा जीवन
समर्पित है ये तन-मन-धन 
'प्रखर' जीवन 
जो बन जाये 
हमें आशीष दे देना। 
 
यह विनम्रता प्रखर जी के मन-मस्तिष्क को रूपायित करती है, क्योंकि वह स्वयं मानते हैं कि "जो जितना /विनम्र है उतना/ शक्तिवान भी है।" उनकी इस विनम्रता का राज उनके आध्यात्मिक चिंतन में छुपा है। वह लिखते हैं  "शक्ति मिली कैसे उसको/ वह भक्तिवान भी है।" भक्तिवान कौन?- वह जो भक्ति करता हो। भक्ति? स्वयं के अंतस का परम सत्य से जुड़ जाना। किसलिए? नकारत्मक भावों को नियंत्रित कर अपने व्यक्तित्व का उन्नयन करने के लिए। तर्कवादियों के लिए यह बात अटपटी हो सकती है, क्योंकि अध्यात्म श्रद्धा एवं विश्वास पर अवलंबित होने के कारण 'परम परमारथ' (तुलसीदास) की संस्तुति करता है। रूसी कवि येव्गेनी येव्तुशैंको भी कहते हैं:- 
 
नेकी को तुम रखो याद
मानो इसे प्रभु का प्रसाद
और मित्र-बंधुओं का आशीर्वाद
मैं कहता हूँ
तब काम मैं मन लगेगा
इधर-उधर कहीं नहीं डिगेगा
और जीवन यह अपना तब
निरन्तर सहज गति से चलेगा। (अनुवाद : राजा खुगशाल एवं अनिल जनविजय)
 
यानी कि सहज जीवन जीने के लिए दूसरों का हित करना श्रेयस्कर है। यानी कि कर भला तो हो भला। यदि न भी हो, तब भी कोई परेशानी की बात नहीं। यहाँ एक बात और भी जरूरी है- चिंतामुक्त होना। कैसे? सम्यक दृष्टि से। प्रखर जी इसे कुछ इस तरह से कहते हैं:-
 
एक वर्ष जीवन का 
और हुआ कम 
काहे की खुशी भला 
काहे का गम 
 
जो था नया कभी 
अब हो गया पुराना 
वर्तमान भूत हुआ 
जिसे नहीं आना 
 
भविष्य तो भविष्य है 
बोलो बम-बम। 
 
यह 'बम-बम' चिंतामुक्त आनन्दमय जीवन जीने की कला सिखाता है और संकेत करता है कि परिस्थितियां कैसी भी हों, घबड़ाना नहीं चाहिए- "प्रश्न कठिन हो चाहे जितना/ होकर सहज करोगे हल तो/ उत्तर निश्चित मिल जायेगा।" इसी को रमाकांत जी कुछ इस तरह से कहते हैं- "जीवन को जीना है/ अपने तरीके से/ जिसको जो कहना है/ कहता रहे वो/ आयेंगी बाधाएं/ उनसे घबराना क्या/ जिसको चलना है तो चलता रहे वो/ जो मंजिल भाये/ वो मंजिल चुन लो।" 
 
आधुनिक जीवन के विविध आयामों को प्रस्तुत करती इस कृति का अपना सौन्दर्य है, अपनी विशिष्टता है। यह सौंदर्य, यह विशिष्टता किसे कितना आकर्षित या विकर्षित करेगी, इसे समय पर ही छोड़ देना उपयुक्त होगा, क्योंकि 'अभी समय है।' कृतिकार को कोटि-कोटि बधाई देते हुए शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी के शब्दों में बस इतना ही कहना चाहूंगा- "मेरा सत्य/ बता दो जाकर/ हर आँगन से, हर चौखट से।"    
 
कृति : अभी समय है (नवगीत)
कवि : प्रमोद प्रखर
प्रकाशक : एकलव्य पब्लिकेशन, रायबरेली, उ.प्र. 
94 55 540892, 7860966625
मूल्य : रु 150/-
वर्ष : 2016
 
- डॉ अवनीश सिंह चौहान 

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