ISSN 2277 260X   

 

International Journal of

Higher Education and Research


 

 

Thursday, 12. April 2018 - 15:01 Uhr

समकालीन गीत की भाषा - नचिकेता


वर्ष 1990 के बाद के गीतों ने समकालीन गीत रचना को एक नयी भाषा दी है जो पूर्ववर्ती गीत परम्परा से भिन्न है। वीरेंद्र आस्तिक, यश मालवीय, अवनीश सिंह चौहान आदि ने उपभोक्तावादी जिंसों तथा कम्प्यूटर के उपयोग में लाये जाने वाले तकनीकी शब्दों को इन गीतों के बिम्ब और प्रतीक के रूप में इस्तेमाल कर गीत-रचना की काव्य भाषा को अत्यधिक आधुनिक और समृद्ध बनाया है। 

- नचिकेता, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक, पटना, बिहार
गीत वसुधा, पृष्ठ 51, 2013


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Tuesday, 10. April 2018 - 11:48 Uhr

अवनीश सिंह चौहान के एसोसियट प्रोफेसर न बनने पर खेद - डॉ पूर्णमल गौड़


डॉ अवनीश सिंह चौहान को डॉ पूर्णमल गौड़ की चिठ्ठी 


ab-singh---copy-1प्रिय अवनीश जी,
आप जैसे योग्य, सुशिक्षित, अनुभवी, उत्कृष्ट लेखक, शोधकर्मी, आदर्श शिक्षक, विश्वविद्यालय के गौरव को  बढाने में सदैव तत्पर, बेहद ईमानदार, छात्र हितैषी, बहुआयामी व्यक्तित्व, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनारों में सहभागिता व अध्यक्षता करने वाले प्राध्यापक को पदोन्नत कर एसोसियट प्रोफेसर बहुत पहले बना देना चाहिए था; अब तक नहीं बनाये जाने के लिए खेद है। मेरी अनन्त मंगल कामनाएं।

आपका,
डॉ पूर्णमल गौड़
सलाहकार, पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं डॉ मंगलसेन चेयर्स
महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक, हरियाणा

(डॉ पूर्णमल गौड़ महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय एवं एसआरएम विश्वविद्यालय, सोनीपत में हिन्दी विभागाध्यक्ष रह चुके हैं )

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Wednesday, 28. March 2018 - 12:26 Uhr

जो करना है अभी करना है - डॉ अवनीश सिंह चौहान


pramod-prakharयदि "हिंदी साहित्‍य के हजारों वर्षों के इतिहास में," जैसा कि हजारीप्रसाद द्विवेदी जी ने कहा है, "कबीर जैसा व्‍यक्तित्‍व लेकर कोई लेखक उत्‍पन्‍न नहीं हुआ," तो समकालीन हिन्दी गीत के इतिहास में भी दिनेश सिंह (रायबरेली) जैसा कवि एवं आलोचक विरले ही दिखाई पड़ता है। कबीर के कवित्‍व के प्रति आज का साहित्य समाज गाहे-बगाहे आश्‍वस्‍त दिखाई पड़ता है, किन्तु दिनेश सिंह के साथ यह स्थिति अब तक नहीं बन पायी है। क्या 'समय' रायबरेली के साहित्यकारों की परीक्षा ले रहा है? कहना भले ही मुश्किल हो, किन्तु 'डलमऊ और निराला' पुस्तक में रामनारायण रमण जी ने महाप्राण निराला के बारे में कुछ इसी तरह से लिखा है। लेकिन रमण जी यह भी मानते हैं कि अच्छा रचनाकार अपनी प्रतिभा, अपने सृजन पर भरोसा रखते हुए सदैव आश्वस्त रहता है कि - 'हम न मरिहैं, मरिहै संसारा' (कबीर) और 'मेरे जीवन का यह है जब प्रथम चरण,/ इसमें कहाँ मृत्यु?/ है जीवन ही जीवन/ अभी पड़ा है आगे सारा यौवन/ स्वर्ण-किरण कल्लोलों पर बहता रे, बालक-मन,/ मेरे ही अविकसित राग से/ विकसित होगा बन्धु, दिगन्त;/ अभी न होगा मेरा अन्त' (निराला)। कबीर की शैली में निराला का 'अभी' शब्द क्या यहाँ 'कभी' का अर्थ नहीं देता है?
 
यदि ऐसा है तो रायबरेली के रचनाकारों का सम्यक मूल्यांकन 'समय रहते' होना चाहिए। सम्यक मूल्यांकन होने से जहाँ सार्थक और प्रतिभाशाली रचनाकारों की परख हो सकेगी, वहीं पता चल सकेगा कि किस रचना (कृति) को क्या स्थान दिया जाना चाहिए। इसी क्रम में रायबरेली से प्रमोद प्रखर जी की पाण्डुलिपि को पढ़ने का अवसर मिला। शीर्षक है - 'अभी समय है।' अद्भुत शीर्षक, जिसमें चेतावनी का संकेत भी है और मित्रवत सलाह भी। 'समय' एक गतिमान सत्ता है, जिसके तीन रूपों (भूतकाल, वर्तमान और भविष्य) में सर्वाधिक गतिशील वर्तमान ही कहा जा सकता है। शायद इसीलिये इस शीर्षक में प्रयुक्त शब्द - 'अभी' समयरेखा पर एक बिंदु के रूप में वर्तमान की सशक्त उपस्थिति का अहसास कराता है। सन्देश यह कि जो करना है 'अभी' करना है। यानी कि अभी नहीं तो कभी नहीं। इस शीर्षक को देखकर बंगाली कवि हरजिन्दर सिंह लाल्टू याद आ गए:- 
 
अभी समय है
कुछ नहीं मिलता कविता बेचकर
कविता में कुछ कहना पाखंड है
फिर भी करें एक कोशिश और
दुनिया को ज़रा और बेहतर बनाएँ।  
 
लाल्टू की तरह प्रखर जी भी दुनिया को बेहतर बनाने की कोशिश पिछले पैंतीस वर्षों से कर रहे हैं, जिसका प्रमाण उनके द्वारा रचित / सम्पादित लगभग एक दर्जन पुस्तकें हैं। यह कोई आसान काम नहीं, वह भी तब जब रचनाकार साहित्य की कई विधाओं में कार्य कर रहा हो। इन तमाम विधाओं में प्रखर जी की सबसे प्रिय विधा कविता ही रही है। शायद इसीलिये परोपकार की भावना से लैस, स्वभाव से विनम्र और व्यवहार में समभाव रखने वाले प्रखर जी कविता को जीवन का पर्याय मानते हैं:-
 
हमारे गीत 
तुम्हारे मन 
जगह अपनी बना लें तो 
हमें आशीष दे देना। 
 
ये कविता है मेरा जीवन
समर्पित है ये तन-मन-धन 
'प्रखर' जीवन 
जो बन जाये 
हमें आशीष दे देना। 
 
यह विनम्रता प्रखर जी के मन-मस्तिष्क को रूपायित करती है, क्योंकि वह स्वयं मानते हैं कि "जो जितना /विनम्र है उतना/ शक्तिवान भी है।" उनकी इस विनम्रता का राज उनके आध्यात्मिक चिंतन में छुपा है। वह लिखते हैं  "शक्ति मिली कैसे उसको/ वह भक्तिवान भी है।" भक्तिवान कौन?- वह जो भक्ति करता हो। भक्ति? स्वयं के अंतस का परम सत्य से जुड़ जाना। किसलिए? नकारत्मक भावों को नियंत्रित कर अपने व्यक्तित्व का उन्नयन करने के लिए। तर्कवादियों के लिए यह बात अटपटी हो सकती है, क्योंकि अध्यात्म श्रद्धा एवं विश्वास पर अवलंबित होने के कारण 'परम परमारथ' (तुलसीदास) की संस्तुति करता है। रूसी कवि येव्गेनी येव्तुशैंको भी कहते हैं:- 
 
नेकी को तुम रखो याद
मानो इसे प्रभु का प्रसाद
और मित्र-बंधुओं का आशीर्वाद
मैं कहता हूँ
तब काम मैं मन लगेगा
इधर-उधर कहीं नहीं डिगेगा
और जीवन यह अपना तब
निरन्तर सहज गति से चलेगा। (अनुवाद : राजा खुगशाल एवं अनिल जनविजय)
 
यानी कि सहज जीवन जीने के लिए दूसरों का हित करना श्रेयस्कर है। यानी कि कर भला तो हो भला। यदि न भी हो, तब भी कोई परेशानी की बात नहीं। यहाँ एक बात और भी जरूरी है- चिंतामुक्त होना। कैसे? सम्यक दृष्टि से। प्रखर जी इसे कुछ इस तरह से कहते हैं:-
 
एक वर्ष जीवन का 
और हुआ कम 
काहे की खुशी भला 
काहे का गम 
 
जो था नया कभी 
अब हो गया पुराना 
वर्तमान भूत हुआ 
जिसे नहीं आना 
 
भविष्य तो भविष्य है 
बोलो बम-बम। 
 
यह 'बम-बम' चिंतामुक्त आनन्दमय जीवन जीने की कला सिखाता है और संकेत करता है कि परिस्थितियां कैसी भी हों, घबड़ाना नहीं चाहिए- "प्रश्न कठिन हो चाहे जितना/ होकर सहज करोगे हल तो/ उत्तर निश्चित मिल जायेगा।" इसी को रमाकांत जी कुछ इस तरह से कहते हैं- "जीवन को जीना है/ अपने तरीके से/ जिसको जो कहना है/ कहता रहे वो/ आयेंगी बाधाएं/ उनसे घबराना क्या/ जिसको चलना है तो चलता रहे वो/ जो मंजिल भाये/ वो मंजिल चुन लो।" 
 
आधुनिक जीवन के विविध आयामों को प्रस्तुत करती इस कृति का अपना सौन्दर्य है, अपनी विशिष्टता है। यह सौंदर्य, यह विशिष्टता किसे कितना आकर्षित या विकर्षित करेगी, इसे समय पर ही छोड़ देना उपयुक्त होगा, क्योंकि 'अभी समय है।' कृतिकार को कोटि-कोटि बधाई देते हुए शिवबहादुर सिंह भदौरिया जी के शब्दों में बस इतना ही कहना चाहूंगा- "मेरा सत्य/ बता दो जाकर/ हर आँगन से, हर चौखट से।"    
 
कृति : अभी समय है (नवगीत)
कवि : प्रमोद प्रखर
प्रकाशक : एकलव्य पब्लिकेशन, रायबरेली, उ.प्र. 
94 55 540892, 7860966625
मूल्य : रु 150/-
वर्ष : 2016
 
- डॉ अवनीश सिंह चौहान 

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Wednesday, 28. March 2018 - 12:21 Uhr

यादों के बहाने: मैं, आखाड़ा और मौसा जी - अवनीश सिंह चौहान


amresh-chauhanसेना में ब्लैक कमांडो रहे परम श्रद्देय श्री अमरेश सिंह चौहान सूबेदार पद से रिटायर होने के बाद अब गांव मछरिया, जनपद मुरादाबाद, उ प्र में रहते हैं। उम्र लगभग 65 वर्ष। सिद्धांतप्रिय, ईमानदार, कड़क मिजाज फौजी अमरेश सिंह जी रिश्ते में तो मेरे सबसे छोटे मौसा जी हैं, किन्तु उनका परिचय सिर्फ इतना ही नहीं है।

 

बात कुछ इस तरह से है। मेरे गृह जनपद में उन दिनों अंग्रेजी से एम ए करने के लिए कोई महाविद्यालय न था। परिस्थितियां भी प्रतिकूल थीं। मौसा जी ने मुझे मुरादाबाद बुला लिया और मेरा दाखिला हिन्दू कॉलेज, मुरादाबाद में करा दिया। मैं मौसा जी के घर पर रहने लगा। संयुक्त परिवार था उनका । दादा-दादी जी, ताऊ-ताई जी, भैया-भाभीजी, बच्चे-बड़े सब एक साथ रहते । हिल-मिलकर, बड़े प्यार से। घर के सभी सदस्य मुझे भी बहुत चाहते, स्नेह देते।

 

मौसा जी और उनके परम सनेही मित्र पहलवान अंगद सिंह, जिन्होंने उस क्षेत्र में पहलवानी का अलख जगा रखा है और अब उनके सुपुत्र सुमित प्रताप सिंह उनकी विरासत को (सेना में बतौर पहलवान) आगे बढ़ा रहे हैं, कभी मुरादाबाद के हाथी अखाड़ा में जोड़ किया करते थे। घर-परिवार के बच्चों पर भी उनका असर था ही। जब मैं मुरादाबाद पहुंचा तो उन्होंने मेरे ढ़ीले-ढाले शरीर को देखकर कहा कि तुम्हे परिवार के बच्चों के साथ अखाड़ा करना चाहिए। फिर क्या था अगले ही दिन मेरा लगोंट सिलवाकर उन्होंने मुझे ट्रैनिंग देना प्रारम्भ कर दिया। मौसा जी मेरे खाने-पीने का विशेष ध्यान रखते; शरीर थकने पर मालिश करते, मेरे साथ दौडने जाते, अखाड़ा करते, शाम को दूर नदी पर टहलने भी जाते। (मौसी जी भी दिन भर अलग-अलग तरह के पौष्टिक व्यंजन बनाने में लगी रहतीं क्योंकि मौसाजी खाने के बहुत शौकीन रहे)। यही क्रम छुट्टियों भर चलता और जब मौसा जी की छुट्टियां खत्म हो जाती, वे देश सेवा के लिए वापस अपनी यूनिट लौट जाते।

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उनकी प्रेरणा और सत्प्रयासों से मछरिया में मुझे लम्बे अरसे तक अखाड़ा करने का सौभाग्य प्राप्त हुआ। खूब कसरत करना और मन लगाकर पढ़ना। बस दो ही काम। कसरत ऐसी कि मैं 250 दंड और 250 बैठक तक लगाने लगा; और पढ़ाई भी ठीक-ठाक रही- 20 वर्ष की आयु में एम ए कर महाविद्यालय में अंग्रेजी विभाग से सेकेंड टॉपर बना। कालांतर में विवाह हुआ ; लेखन भी करने लगा तो कसरत-वसरत भी छूट गयी। लेकिन वह घर न छूटा, गांव न छूटा, माटी न छूटी, रिश्ता बना रहा। अटूट।

 

अब जब भी अपने दोंनो बेटों को गांव लेकर जाता हूँ, तब मौसा जी और पहलवान ताऊ जी बस यही पूछते, "क्यों अवनीश, बच्चे बड़े हो रहे है, इन्हें अखाड़े में डाला कि नहीं। बुद्धि के साथ तंदुरस्ती भी जरूरी है।" और जब मैं उस अखाड़े की माटी को प्रणाम करता हूं (जोकि अब खेत में तब्दील हो गयी है , क्योंकि वहां के पेड़ कट गए, कुआ पट गया और उनके बीच में अखाड़ा जुत गया), तब वह भी मुझसे कई सवाल पूछती है, जिनका मेरे पास कोई उत्तर नहीं होता!

 

- अवनीश सिंह चौहान


 


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Thursday, 9. November 2017 - 12:10 Uhr

A Signature Workshop by GOPTA


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Honoured to have been invited to a signature workshop on 'How To Add 50000 Productive Hours To Your Life' organized by GOPTA at India International Center, New Delhi on Aug 20, 2017. The workshop was highly successful and profoundly memorable due to the captivating and motivational discourses of my dear friend Mr Sanjay Kumar Agarwal, the rising star of modern India. Thankful to Sanjay Ji, dear Prakhar, energetic Lalima and benign Sanjay Sharan Sir (IRS) for their wonderful company. - Abnish Singh Chauhan


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Remarks:

 

Thanks, Abnish Sir. It was my pleasure and privilege to have your gracious presence in my workshop. All of the participants benefitted from your thoughts and lively stories from your vast reservoir of experience and learning. Hope to see you again, sir, in my next workshop titled, 'Success Unlimited- Unlock Your True Potential' at India International Center, New Delhi on Nov 19, 2017.

 

- Sanjay Kumar Agarwal, Chairman & CEO, GOPTA Success Pvt. Ltd.

 

Dear Dr Chauhan, congratulations for remarkable invitations from VIPs for active and contributive participation in excellent programs. There are a few persons like you who are invited for chairing university, state, national and international level conferences, workshops and seminars. Keep it up.

 

- Dr P M Gaur, Professor & Head, Department of Hindi, SRMU, Delhi-NCR, Sonepat​


 


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