ISSN 2277 260X   

 

International Journal of

Higher Education and Research


 

 

Friday, 17. November 2017 - 13:35 Uhr

पुस्तक समीक्षा : गीत अपने ही सुने का प्रेम-सौंदर्य - अवनीश सिंह चौहान


geet-apne-hi-suneहिन्दी साहित्य की सामूहिक अवधारणा पर यदि विचार किया जाए तो आज भी प्रेम-सौंदर्य-मूलक साहित्य का पलड़ा भारी दिखाई देगा; यद्यपि यह अलग तथ्य है कि समकालीन साहित्य में इसका स्थान नगण्य है। नगण्य इसलिए भी कि आज इस तरह का सृजन चलन में नहीं है, क्योंकि कुछ विद्वान नारी-सौंदर्य, प्रकृति-सौंदर्य, प्रेम की व्यंजना, अलौकिक प्रेम आदि को छायावाद की ही प्रवृत्तियाँ मानते हैं। हिन्दी साहित्य की इस धारणा को बहुत स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। कारण यह कि जीवन और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, यही दोनों की इयत्ता भी है और इसीलिये ये दोनों जिस तत्व से सम्पूर्णता पाते हैं वह तत्व है- प्रेम-राग। 
 
इस दृष्टि से ख्यात गीतकवि और आलोचक वीरेन्द्र आस्तिक जी का सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह ‘गीत अपने ही सुनें' एक महत्वपूर्ण कृति मानी जा सकती है। बेहतरीन शीर्षक गीत- "याद का सागर/ उमड़ आया कभी तो/ गीत अपने ही सुने" सहित इस कृति में कुल 58 रचनाएं हैं जो तीन खण्डों में हैं, यथा- 'गीत अपने ही सुनें', 'शब्द तप रहा है' तथा 'जीवन का करुणेश'। तीन खण्डों में जो सामान्य वस्तु है, वह है- प्रेम सौंदर्य। यह प्रेम सौंदर्य वाह्य तथा आन्तरिक दोनों स्तरों पर दृष्टिमान है। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सौंदर्य का संतुलित समावेश कर सारभौमिक तत्व को उजागर करते हुए कवि संघर्ष और शान्ति (वार एन्ड पीस) जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों से जीवन में आए संत्रास को खत्म करना चाहता है; क्योंकि तभी कलरव (प्रकृति) रूपी मूल्यवान प्रेम तक पहुँचा जा सकता है- "सामने तुम हो, तुम्हारा/ मौन पढ़ना आ गया/ आँधियों में एक खुशबू को/ ठहरना आ गया। देखिये तो, इस प्रकृति को/ सोलहो सिंगार है/ और सुनिये तो सही/ कैसा ललित उद्गार है/ शब्द जो
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व्यक्त था/ अभिव्यक्त करना आ गया। धान-खेतों की महक है/ दूर तक धरती हरी/ और इस पर्यावरण में/तिर रही है मधुकरी/ साथ को, संकोच तज/ संवाद करना आ गया। शांतिमय जीवन;/ कठिन संघर्ष है/ पर खास है/ मूल्य कलरव का बड़ा/ जब हर तरफ संत्रास है/ जिन्दगी की रिक्तता में/ अर्थ भरना आ गया।" 

veerendra-aastik-1आस्तिक जी का मानना है कि कवि की भावुकता ही वह वस्तु है जो उसकी कविता को आकार देती है; क्योंकि सौंदर्य न केवल वस्तु में होता है, बल्कि भावक की दृष्टि में भी होता है। कविवर बिहारी भी यही कहते हैं "समै-समै सुन्दर सबै रूप कुरूप न होय/मन की रूचि जैसी जितै, तित तेती रूचि होय।" शायद इसीलिये आस्तिक जी की यह मान्यता भाषा-भाव-बिम्ब आदि प्रकृति उपादानों के विशेष प्रयोगों द्वारा सृजित उनके गीतों को सर्वांग सुन्दर बना देती है। समाज, घर-परिवेश और दैन्य जीवन के शब्द-चित्रों से लबरेज उनके ये गीत प्रेम की मार्मिक अनुभूति कराने में सक्षम हैं- "दिनभर गूँथे/ शब्द,/ रिझाया/ एक अनूठे छंद को/ श्रम से थका/ सूर्य घर लौटा/ पथ अगोरती मिली जुन्हाई/ खूँद रहा खूँटे पर बछड़ा/ गइया ने हुंकार लगायी/ स्वस्थ सुबह के लिये/ चाँदनी/ कसती है अनुबंध को।" 
 
जीवन के अंतर्द्वंद्वों की कविताई करना इतना सरल भी नहीं है। उसके लिए कठिन तपश्यर्चा की आवश्यकता होती है। कवि यह सब जानता है- "गीत लिखे जीवन भर हमने/ जग को बेहतर करने के/ किन्तु प्रपंची जग ने हमको/ अनुभव दिये भटकने के/ भूलें, पल भर दुनियादारी/ देखें, प्रकृति छटायें/ पेड़ों से बतियायें।" इतना ही नहीं, कहीं-कहीं कवि की तीव्र उत्कंठा प्रेम को तत्व-रूप में देखने की होती है, तब वह इतिहास और शोध-संधानों आदि को भी खंगाल डालता है; तिस पर भी उसके सौंदर्य उपादान गत्यात्मक एवं लयात्मक बने रहते हैं और मन पर सीधा प्रभाव डालते हैं। कभी-कभी तो वह स्वयं के बनाए मील के पत्थरों को भी तोड़ डालता है, कुछ इस तरह- "मुझसे बने मील के पत्थर/ मुझसे ही टूट गए/ पिछली सारी यात्राओं के/ सहयात्री छूट गए/ अब तो अपने होने का/ जो राज पता चलता है/ उससे/ रोज सामना होता है"  और - "हूँ पका फल/ अब गिरा मैं तब गिरा/ मैं नहीं इतिहास वो जो/ जिन्दगी भर द्रोण झेले/ यश नहीं चाहा कभी जो/ दान में अंगुष्ठ ले ले/ शिष्य का शर प्रिय/जो सिर मेरे टिका।" 
 
निष्कर्ष रूप में कहना चाहता हूँ कि जीवन के शेषांश में समग्र जीवन को जीने वाले वीरेन्द्र आस्तिक जी की पुस्तक ‘गीत अपने ही सुने’ के गीत इस अर्थ में संप्रेषणीय ही नहीं, रमणीय भी हैं कि प्रेम-सौंदर्य के बिना जीवन के सभी उद्देश्य निरर्थक-सेे हो जाते हैं। विश्वास है कि सहृदयों के बीच यह पुस्तक अपना स्थान सुनिश्चित कर सकेगी।

पुस्तक : गीत अपने ही सुने                   
कवि : वीरेन्द्र आस्तिक
ISBN: 978-81-7844-305-8
प्रकाशक : के के पब्लिकेशन्स, 4806/24, भरतराम रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2        
प्रकाशन वर्ष : 2017, पृष्ठ : 128, मूल्य: रु 395/-
 

समीक्षक :
 
abnish-singh-chauhan-1युवा कवि, अनुवादक, सम्पादक डॉ अवनीश सिंह
​ चौहान
का जन्म 04 जून, 1979, चन्दपुरा (निहाल सिंह), इटावा (उत्तर प्रदेश) में हुआ। शिक्षा: अंग्रेज़ी में एम०ए०, बी०एड०, एम०फिल० एवं पीएच०डी०। 'शब्दायन' एवं 'गीत वसुधा' आदि समवेत संकलनों में आपके गीत और मेरी शाइन (आयरलेंड) द्वारा सम्पादित अंग्रेजी कविता संग्रह 'ए स्ट्रिंग ऑफ़ वर्ड्स' (2010) एवं डॉ चारुशील एवं डॉ बिनोद द्वारा सम्पादित अंग्रेजी कवियों का संकलन "एक्जाइल्ड अमंग नेटिव्स" में रचनाएं संकलित। आपकी आधा दर्जन से अधिक अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों में पढ़ी-पढाई जा रही हैं। आपका गीत संग्रह 'टुकड़ा कागज़ का' काफी चर्चित हुआ। आपने 'बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता' पुस्तक का संपादन किया है। आप वेब पत्रिका पूर्वाभास के सम्पादक हैं। 'अंतर्राष्ट्रीय कविता कोश सम्मान', मिशीगन- अमेरिका से 'बुक ऑफ़ द ईयर अवार्ड', राष्ट्रीय समाचार पत्र 'राजस्थान पत्रिका' का 'सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार', अभिव्यक्ति विश्वम् (अभिव्यक्ति एवं अनुभूति वेब पत्रिकाएं) का 'नवांकुर पुरस्कार', उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान- लखनऊ का 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' आदि से अलंकृत।


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Tuesday, 31. October 2017 - 15:00 Uhr

संस्मरण : अभी मन भरा नहीं - अवनीश सिंह चौहान


indra-3सुविख्यात साहित्यकार श्रद्देय देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' जी (साहिबाबाद-गाज़ियाबाद) से कई बार फोन पर बात होती— कभी अंग्रेजी में, कभी हिन्दी में, कभी ब्रज भाषा में। बात-बात में वह कहते कि ब्रज भाषा में भी मुझसे बतियाया करो, अच्छा लगता है, आगरा से हूँ न इसलिए। उनसे अपनी बोली-बानी में बतियाना बहुत अच्छा लगता। बहुभाषी विद्वान, आचार्य इन्द्र जी भी खूब रस लेते, ठहाके लगाते, आशीष देते, और बड़े प्यार से पूछते— कब आओगे? हर बार बस एक ही जवाब— अवश्य आऊँगा, आपके दर्शन करने। बरसों बीत गए। कभी जाना ही नहीं हो पाया, पर बात होती रही।

इधर पिछले दो-तीन वर्ष से मेरे प्रिय मित्र रमाकांत जी (रायबरेली, उ.प्र.) का आग्रह रहा कि कैसे भी हो इन्द्र जी से मिलना है। उन्हें करीब से देखना है, जानना-समझना है। पिछली बार जब वह मेरे पास दिल्ली आये, तब भी सोचा कि मिल लिया जाय। किन्तु, पता चला कि वह बहुत अस्वस्थ हैं, सो मिलना नहीं हो सका। एक कारण और भी। मेरे अग्रज गीतकार जगदीश पंकज जी जब भी मुरादाबाद आते, मुझसे सम्पर्क अवश्य करते। उनसे मुरादाबाद में कई बार मिलना हुआ, उठना-बैठना हुआ। फोन से भी संवाद चलता रहा। उन्होंने भी कई बार घर (साहिबाबाद) आने के लिए आमंत्रित किया। प्रेमयुक्त आमंत्रण। सोचा जाना ही होगा। जब इच्छा प्रबल हो और संकल्प पवित्र, तब सब अच्छा ही होता है। 29 अक्टूबर 2017, दिन रविवार को भी यही हुआ।

सुखद संयोग, कई वर्ष बाद ही सही, कि रायबरेली से प्रिय साहित्यकार रमाकान्त जी का शनिवार को दिल्ली आना हुआ; कारण— हंस पत्रिका द्वारा आयोजित 'राजेन्द्र यादव स्मृति समारोह' में सहभागिता करना। बात हुई कि हम दोनों कार्यक्रम स्थल (त्रिवेणी कला संगम, तानसेन मार्ग, मंडी हाउस, नई दिल्ली) पर मिलेंगे। मिले भी। कार्यक्रम के उपरांत मैं उन्हें अपने फ्लैट पर ले आया। विचार हुआ कि कल श्रद्धेय इन्द्र जी का दर्शन कर लिया जाय और इसी बहाने गाज़ियाबाद के अन्य साहित्यकार मित्रों से भी मुलाकात हो जाएगी। सुबह-सुबह (रविवार को) जगदीश पंकज जी से फोन पर संपर्क किया, मिलने की इच्छा व्यक्त की। उन्होंने सहर्ष अपनी स्वीकृति दी और साधिकार कहा कि दोपहर का भोजन साथ-साथ करना है।

indra-5फिर क्या था हम जा पहुंचे उनके घर। सेक्टर-दो, राजेंद्रनगर। समय- लगभग 12 बजे, दोपहर। स्वागत-सत्कार हुआ। मन गदगद। अग्रज गीतकार संजय शुक्ल जी भी आ गए। हम सभी लगे बतियाने। देश-दुनिया की बातें— जाति, धर्म, राजनीति, साहित्य पर मंथन; यारी-दोस्ती, संपादक, सम्पादकीय की चर्चा; दिल्ली, लखनऊ, इलाहबाद, पटना, भोपाल, कानपुर पर गपशप। बीच-बीच में कहकहे। सब कुछ आनंदमय। वार्ता के दौरान दो-तीन बार पंकज जी का फोन घनघनाया। वरिष्ठ गीतकार कृष्ण भारतीय जी एवं साहित्यकार गीता पंडित जी के फोन थे। पंकज जी ने उन्हें अवगत कराया कि रमाकांत और अवनीश उनके यहाँ पधारे हैं। नमस्कार विनिमय हुआ। पंकज जी ने भारतीय जी से बात भी करवायी। पता चला कि भारतीय जी की सहधर्मिणी का निधन हो गया, सुनकर बड़ा कष्ट हुआ, हमने सुख-दुःख बाँटे। रमाकांत जी ने भी उन्हें सांत्वना दी। रमाकांत जी ने फोन पंकज जी को दे दिया। भारतीय जी ने पंकज जी से आग्रह किया कि उनकी पुस्तक हमें दे दी जाय।
भारतीय जी की ओर से शुभकामनाएं लिखकर पंकज जी ने उनका सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह 'हैं जटायु से अपाहिज हम' मुझे और रमाकांत जी को सप्रेम भैंट किया; संजय शुक्ल जी ने भी अपना गीत संग्रह 'फटे पाँवोँ में महावर' उपहारस्वरुप प्रदान किया। पंकज जी से न रहा गया, बोले कि एक फोटो हो जाय। सहयोग और सहभागिता के लिए उन्होंने अपनी धर्मपत्नी जी को बुलाया और दोनों सदगृहस्थों ने बड़ी आत्मीयता से हम सबका फोटो खींचा।

indra-2तीन बजने वाले थे। बिना देर किये  देवेन्द्र शर्मा 'इन्द्र' जी के यहाँ पहुंचना था, क्योंकि उन्हें विद्वान लेखक ब्रजकिशोर वर्मा 'शैदी' जी की 'नौ पुस्तकों' के लोकार्पण समारोह में 4 बजे जाना था। सो निकल पड़े। ई-रिक्शा से। 5-7 मिनट में पहुँच गए, उनके घर। विवेकानंद स्कूल के पीछे, सेक्टर-तीन, राजेन्द्र नगर। दर्शन किये। अभिभूत, स्पंदित। लगभग 84 वर्षीय युवा इंद्र जी। गज़ब मुस्कान, खिलखिलाहट, जीवंतता- ऐसी कि मन मोह ले। उनकी दो-तीन बातें तो अब भी मेरे मन में हिलोरे मार रही हैं। वह बोले, 'मुझे ठीक से कुर्ता पहना दो, सजा दो, फोटो जो खिंचवानी है'; 'क्यों हनुमान (जगदीश पंकज जी), स्वर्गवाहिनी का इंतज़ाम हुआ कि नहीं?' (कार्यक्रम में जाने के लिए कैब बुकिंग के सन्दर्भ में); 'अवनीश, फिर आना, अभी मन भरा नहीं।' बड़े भाग हमारे जो उनसे मिलना हुआ। वह भी मिले तो ऐसे जैसे वर्षों से मिलना-जुलना रहा हो हमारा। क्या कहने! समय कम था, फिर भी, हमारी मुलाकात सार्थक और आनंदमय रही। ​जय-जय।


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Tags: Dr Abnish Singh Hindi Literature Meeting संस्मरण  अवनीश सिंह चौहान अभी मन भरा नहीं Abnish Singh Chauhan 

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Friday, 13. October 2017 - 13:42 Uhr

अवनीश के गीतों में ताज़गी है - सुधांशु जी महाराज



विश्व जागृति मिशन : आनंद धाम, दिल्ली में अन्तरराष्ट्रीय गणेश-महालक्ष्मी महायज्ञ के अवसर पर परम पूज्य आचार्य श्री सुधांशु जी महाराज से मिलने का सौभाग्य पिछले शुक्रवार (अक्टूबर 06, 2017) को मिला। अवसर था श्रद्धेय देवेंद्र देव जी का गीत-संग्रह 'आवाज दे रहा महाकाल' का लोकार्पण।

लोकार्पण के पश्चात उदारमना, युग ऋषि सुधांशु जी महाराज से पुनः उनके आश्रम के एक कक्ष में मुलाकात हुई, तो इच्छा जगी कि उन्हें अपना गीत संग्रह # टुकड़ा काग़ज़ का # (बोधि प्रकाशन, जयपुर) भैंट कर दूं। भैंट किया। उन्होंने मेरे गीत संग्रह को सहर्ष स्वीकार किया और मुझे अपना आशीर्वाद दिया। कहा कि आपके गीतों में ताज़गी है, भाषा में प्रवाह है, शब्दों में नवीनता है, बिम्ब आकर्षक हैं। उन्होंने मेरे एक गीत 'बच्चा सीख रहा टीवी से/ अच्छे होते हैं ये दाग़' की कुछ पंक्तियां- "टॉफी, बिस्कुट, पर्क, बबलगम/खिला-खिला कर मारी भूख/माँ भी समझ नहीं पाती है/कहाँ हो रही भारी चूक। माँ का नेह/मनाए हठ को/लिए कौर में रोटी-साग/अच्छे होते हैं ये दाग़।" भी पढ़कर सुनायी। और कहा कि वह इस नये प्रयोगों से लैस गीत संग्रह को अपने साथ ले जा रहे हैं। आराम से पढ़ने के लिए। यह सब देख-सुन मैं गदगद हो गया।

कक्ष में उपस्थित आदरणीय आचार्य देवेन्द्र देव जी, कविवर क्रान्त एम एल वर्मा जी, अग्रज कवि शम्भू ठाकुर जी, भाई अमर सोनी जी और उदितेन्दु 'निश्चल' जी की उपस्थिति ने बल दिया। इस आत्मीय प्रक्रिया में श्रद्देय श्री राम महेश मिश्र जी, निदेशक- कार्यक्रम एवं विकास, का ह्रदय से आभार।

- अवनीश सिंह चौहान



A Comment on Tukda Kagaz Ka by Sudhanshu Ji Maharaj


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Friday, 20. January 2017 - 11:55 Uhr

Special Issue on Indian Poetry in English


logo-cc-1The new Issue of Creation and Criticism (Issue 04, Jan 2017) is now live and can be viewed at www.creationandcriticism.com.
 
The issue besides the usual sections, has a special focus on: Indian Poetry in English reflecting a “rich collection” of interview, literary articles, research papers, book reviews and poems by as many as 24 poets from all over the country.
 
The interview section covers an interesting conversation with D C Chambial, an esteemed poet and editor, by Editor-in-Chief Dr Sudhir K Arora.
 
Under Literary Articles, renowned author Prof Satish Kumar, poet & critic Dr Shaleen Kumar Singh and Editor-in-Chief Dr Sudhir K Arora not only present the survey of Indian Poetry in English but also underline the contribution of 'young and old' poets of the Contemporary Indian English Poetry.
 
The next section contains 4 well-written research papers – Imagery in Shiv K Kumar’s Where have the Dead Gone? and Jayanta Mahapatra’s Hesitant Light by C L Khatri, Poetic Representations: Cultural Differences in Hindi and English Reading R. K. Singh’s Poetry Through Translation by Varsha Singh, A Study in Imagery of Swami Vivekananda’s Poetry by Vishesh Kumar Pandey and Indianness in Kamala Das’s ‘The Old Playhouse’ and ‘Composition’ by Mansha-Ashraf.
 
There are Reviews of 5 interesting books – Cultural and Philosophical Reflections in Indian Poetry in English in Five Volumes by Sudhir K Arora. (Reviewed by P C K Prem), For You To Decide by C L Khatri (Reviewed by Sandhya Saxena), Poetry Today by Pronab Kumar Majumder (Rev. by Madhubala Saxena), Songs of Love: A Celebration by P K Padhy
and Ashes and Embers by Madan G Gandhi (Rev. by Sudhir K Arora).
 
And please don’t miss the compulsive poetic delight in the following section- Poetry - with a tribute to Late Premananda Panda:
 
Aju Mukhopadhyay
Alka Agrawal
Archna Sahni
Bharati Nayak
Binod Mishra
C L Khatri
D C Chambial
Elsy Satheesan
Gopikrishnan Kottoor
I K Sharma
K V Raghupati
O P Arora
P C K Prem
P G Rama Rao
P K Panda
Pashupati Jha
R C Shukla
R K Bhushan
Rajiv Khandelwal
R K Singh
Susheel K Sharma
Syed Ali Hamid
Umashanker Yadav
Zafar Khan
 
Our forthcoming Issue (April 2017) also has equally promising features. Please visit the 'Call for Papers' page for details; your contributions are most welcome.
 
And let us reiterate our request: before sending your work please follow the guidelines given in ‘Submission.’ If you still have any question, you may please ask me or the editors concerned.
 
As ever, we do value your advices and responses. Please take some time off, on and off, to traverse the contents.
 
Warm wishes.
Abnish (Managing Editor)

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Saturday, 24. December 2016 - 13:00 Uhr

टुकड़ा कागज़ का : लघुता में विराटता - वीरेंद्र आस्तिक


लघुता में विराटता - वीरेंद्र आस्तिक


बात डॉ  नगेन्द्र के कथन से शुरू करता हूँ। वे कहा करते थे- ‘स्थापितों का मूल्यांकन और उनकी व्याख्या तो बार-बार हो सकती है, उनकी आलोचना भी बार-बार हो सकती है, किन्तु उन पर शोध् नहीं। शोध् तो अज्ञात को ज्ञात करना है। उपेक्षितों को स्थापित करना है।’ डॉ नगेन्द्र की बात मेरी समझ में भी आई। हमारे साहित्य समाज मंे और शैक्षिक संस्थानों में तो स्थापितों को ही बार-बार स्थापित किया जाता है। ऐसे ही वातावरण से ऊबकर कभी नामवर जी ने भी कहा था- ‘विश्वविद्यालय और शैक्षिक संस्थान प्रतिभा घोंटू संस्था में बदल चुके हैं।’ बहरहाल ऐसी अवधरणाओं को मान्य ठहराते हुए  डॉ विमल ने एक महत्वपूर्ण शोध् करवाया, अनुसंधता थीं डॉ शकुंतला राठौर। उन्होंने छायावाद के लगभग 36 गौणकवियों का अनुसंधन किया। इस शोधकार्य द्वारा छायावाद की कई पूर्व स्थापनाएँ निरस्त हुईं और कई पर नई रोशनी पड़ी, जिसकी भूरि-भूरि प्रशंसा डॉ नगेन्द्र और नामवर जी दोनों ने की। 
 
कहना चाहूँगा कि युवा रचनाकार ही सबसे अध्कि उपेक्षित होते हैं। युवा रचनाकारों के उपेक्षित होने का अर्थ है- हम स्थापित और मान्य अवधरणाओं की सहूलियत के आगे मौलिक और नवीन चेतना पर बात करने की जहमत उठाना नहीं चाहते। डॉ विमल ने जहमत उठाई तो कुछ युवा और गौण रचनाकार स्थापित हुए, साथ ही शोध् संस्थानों की जड़वत परम्परा भी टूटी। लेकिन यह सफलता तब तक एक अपवाद ही मानी जाएगी, जब तक ऐसे शोध् कार्य प्रचलन में न आ जाएँ। 
 
किसी युवा रचनाकार के पहले काव्य संग्रह से गुजरने के बाद जेहन में इतिहास के उपरोक्त प्रसंगों का ताजा हो जाना कृति के प्रति एक सार्थक संकेत ही है। साहित्य में युवा रचनाकारों का पैर- जमाऊ कार्य मुझे आश्वस्त करता रहा है। मैंने देखा है, अपार-अगम भ्रष्टाचारी दलदल के बीच कम उम्र का साहस। कामयाबी के संघर्ष में एक-एक पंखुड़ी को जोड़ते हुए कमलवत होने की अभीप्सा को जीवित रखना कोई आसान कार्य नहीं। लेकिन हैं ऐसे साहित्य समर्पित सिपाही जिनका गीत प्रादुर्भूत होता है- नोन, तेल, लकड़ी से लेकर साहित्य, शिक्षा और नौकरी तक के आसन्न संकटों के बीच। 
 
ऐसे ही युवा रचनाकार हैं अवनीश सिंह चैहान। अवनीश की पाण्डुलिपि जब मेरे पास आई तो कृति-शीर्षक ही देखकर मन विस्मय से भर उठा- ‘टुकड़ा कागज़ का।’ यह ‘टुकड़ा कागज़ का’ मुझे दिखाने लगा सपनों की दुनिया। तत्क्षण मैंने पहले यही गीत पढ़ा। आह! ‘टुकड़ा कागज़ का।’ यह एक रूपक गीत है। यह उस लाखैर आदमी की भुक्त-कथा है जो क्रूर समय के थपेड़ों की मार झेल रहा है। यह गीत शोषकों पर व्यंग्य भी है, किन्तु अन्तिम पंक्तियाँ जिस विराट बिम्ब का सृजन करती हैं- सोचने पर विवश कर दिया- 
 
कभी कोयले-सा धधका 
फिर राख बना, रोया 
माटी में मिल गया 
कि जैसे 
माटी में सोया 
 
चलता है हल 
गुड़ता जाए 
टुकड़ा कागज़ का। 
 
साधरण चीजों में दैवीय और महनीय गुणों को देखने की दृष्टि ने मुझे चैंका दिया। कवि की आंतरिक तबियत को जानने की उत्कंठा से मैं कृति को आद्योपांत पढ़ गया। विस्मय की बात यह रही कि पाठ के दौरान महाप्राण निराला कहीं-कहीं ताल देते जा रहे थे। शब्दस्फुरण में महान आदर्शों का स्मरण कराने की शक्ति होती है। निराला जी लघु में विराट को देखने के लिए लघुतर होते जाने की जिस साधना पर जोर देते हैं, वो वास्तव में शक्ति की साधना ही है। निराला जी कहते हैं- तुम अपने में सूक्ष्म (लघु) को देखने की शक्ति का संचार करो। जिस प्रकार आँखों के तिल में पूरा आकाश समा जाता है, गागर में सागर समा जाता है- 
 
आँखों के तिल में दिखा गगन 
वैसे कुल समा रहा है मन 
तू छोटा बन, बस छोटा बन 
गागर में आएगा सागर। (आराधना से) 
 
निराला की तमाम रचनाओं में लघु का विराटीकरण पूरे परिदृश्य के साथ उपस्थित हुआ है, लेकिन दूसरी तरफ शोषक और शोषित का वर्तमानीकरण भी हुआ। ‘राम की शक्ति पूजा’ और ‘कुकुरमुत्ता’ सर्वोत्तम उदाहरण हैं। निराला छोटे आदमी को वहिर्जगत के द्वन्दों में नहीं झोंकना चाहते। वहाँ तो वह सामंतों-शोषकों से मात खा ही रहा है। उस पूरी व्यवस्था के विकल्प में उनका मानना है कि लघु और विराट के द्वन्द्वात्मक संबन्ध् की ऊर्जा को यदि छोटा आदमी अपने भीतर संजोएगा तो एक दिन वह शक्तिशाली हो उठेगा। आणुविक थ्योरी के अनुसार लघु संपूर्ण (विराट) का एक घटक ही है। जैसे ब्रह्माण्ड के घटक हैं, ग्रह-नक्षत्र आदि। ‘तू छोटा बन, बस छोटा बन’, अर्थात् लघु से लघुतर होते जाना एक व्यंजनात्मक संकेत है, उसी आणुविक थ्योरी की ओर। लघुकण का सबसे सूक्ष्मकण ‘परमाणु’ होता है, जिसके बनते ही वह परमशक्तिशाली हो उठता है। 
 
अवनीश चैहान के सृजन में उपरोक्त तत्वों के संकेत हैं, जहाँ उनकी काल्पनिक, भावुक और नैसर्गिक शक्तियों का, यथार्थ के परिप्रेक्ष्य में समाजीकरण हुआ है। कहना चाहूँगा कि शक्ति का विलय (‘राम की शक्ति पूजा’ आदि के संदर्भ में) महाशक्ति में होना ही निराला का महाप्राण होना है। यहाँ ‘टुकड़ा कागज़ का’ अन्ततः मिट्टी में गुड़कर महाशक्ति में एक लय हो विलीन हो जाता है। 
 
इसी प्रकार कवि के कुछ गीतों में ‘दूब’ और ‘तिनका’ जैसी अति सामान्य चीजें असामान्य बनकर विराट बिम्ब का सृजन करती हैं। इन विषयों पर मेरे संज्ञान में आए अब तक के गीतों में ये गीत श्रेष्ठ लगते हैं। ‘एक तिनका हम’ की मानवीयता हमंें झकझोर देती है। ऐसे गीतों में कवि की अनुभूति उसके कष्ट-साध्य संघर्षों से सघन हो गई है। यहाँ भी निरीह और दलित व्यक्ति का प्रतीक है तिनका। इस शब्द की गहनतर अर्थमीमांसा हुई है गीत में, जिसकी सविस्तार व्याख्या अपेक्षित है। अन्तिम पंक्तियों में वह तिनका कह उठता है- 
 
साध् थी उठ राह से 
हम जुड़ें परिवार से 
आज रोटी सेंक श्रम की 
जिंदगी कर दी हवन। 
 
एक तिनके (निरीह व्यक्ति) का यह उत्सर्ग क्या गीत को कालजयी नहीं बनाएगा? गज़ब का गीत है, गज़ब की कविता है यह। 
 
आज हमारे सामने जिजीविषा की जो वैश्विक चुनौतियाँ हैं। हमारे समाज की और समाज के निचले से निचले स्तर की समस्याओं के जो प्रतिरोध् हैं और उनके जो भविष्य-बोध् हैं उस पूरे लोक पर अवनीश की दृष्टि है। यहाँ इस पुस्तक द्वारा उठाए गए सभी पक्षों पर बात संभव नहीं, पर हाँ, इस कृति के लिए जो ज्यादा जरूरी है, उस पर अपनी राय अवश्य रखने का प्रयत्न कर रहा हूँ। 
 
कवि के गीतों में आधुनिकता-बोध् की प्रखरता है। यह दूसरी बड़ी विशेषता है। आधुनिकता को स्थापित करने में सबसे पहले युवा वर्ग ही आगे आता है जो स्वाभाविक ही है। नवगीत पर विचार करने से पहले हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि सही मायने में नवगीत एक आधुनिक अवधरणा है, जिसकी जड़ें हमें नवजागरणकाल से जोड़ती हैं। जहाँ हमारी वस्तुपरकता और तथ्यपरकता में तीव्रता आती है और हम पहले से ज्यादा विज्ञान सापेक्ष और समय सापेक्ष होते चले जाते हैं। नव-जागरणकाल की अवधरणा के साथ साहित्य का भी मुख्य तत्व था स्वातंत्रयबोध्, जिससे हमारे जीवन के सभी सरोकार प्रभावित होते गए। हिन्दी साहित्य में नवजागरणकाल से प्रभावित होने वाले पहले कवि हैं महाप्राण निराला। इसलिए मैं निराला को पहला क्रान्तिकारी आधुनिक कवि मानता हूँ। 
 
दुर्भाग्य से हमारे देश में ‘आधुनिकता’ शब्द यूरोप के ‘मॉडर्निटी’ शब्द का पूरी तरह से पर्याय नहीं बन पाया। उत्तर आधुनिकतावाद भी नहीं। वह मूल्यों को और भी विक्रत कर रहा है, समाज में और साहित्य में भी। यह संग्रह हमें आधुनिकता का प्रमुखता से दो रूपों में अवलोकन कराता है- आधुनिकता का एक अर्थ है जो हमें स्वतंत्रता, संयम, वैज्ञानिकता, तार्किकता, भविष्यधर्मिता और संलक्ष्यता आदि का बोध् कराता है। दूसरी तरफ वह फैशन तथा फैशन के रूप में ओढ़ी हुई अंग्रेजियत, अपसांस्कृतिकता, अनैतिकता और अंधविश्वास आदि को अर्थ देता है। यह दूसरे प्रकार का जो आधुनिकताबोध् है वही हमारे समाज को और हमारी बाल और युवा पीढ़ी को उच्श्रृंखल और मिथ्याचारी बना रहा है अर्थात् आधुनिकता शब्द की सही व्यंजना और सही हनक-धमक को खण्डित कर रहा है। टूटी-फूटी अंग्रेजी बोलने से, जीन्स शर्ट-टाई पहनने से और पिता की कमाई को क्लबों- होटलों में बहाने से कोई मॉडर्न नहीं बन जाता। गैरिक वस्त्र धरण कर और सन्यासी होकर भी विवेकानंद मॉडर्न थे। धर्म के पृष्ठाधर पर आधुनिकता के प्रथम उद्घोषक हुए हैं विवेकानंद और उसके बाद 20 वीं शती में ओशो एवं प्रभात रंजन सरकार। 
 
अवनीश के अधिकांश गीतों में उपरोक्त परिदृश्य का कथ्य अभिव्यक्त हुआ है। हर युग के अपने-अपने पाखंड और अंधविश्वास हो जाते हैं। सनातन मूल्य युग की गर्द से जो थोड़े धूमिल दिखाई देने लगते हैं, उस गर्द को झाड़ना ही आधुनिक होना है। कबीर अपने समय के सबसे बड़े आधुनिक हुए। मानवतावादी हुए। उनके युग में छुआछूत और मूर्तिपूजा का बोलबाला था। उन्होंने एक दोहा प्रचारित कर उस कुलीनवादी परम्परा को चुनौती दे दी जो हज़ारों वर्षों से आरूढ़ थी। आधुनिकता (ज्ञान-विज्ञान) की एक चिंगारी ने अंधविश्वास पर चोट ही नहीं की, साधरणजनों का हृदय परिर्विर्तत कर दिया और अस्पृश्यों के लिए ज्ञान मार्ग का द्वार खोल दिया- 
 
पाहन पूजैं हरि मिलैं तो मैं पूजूँ पहार 
वा ते वो चाकी भली, पीस खाय संसार। 
 
अवनीश भी फैशनपरस्ती पर चोट कर रहे हैं, लेकिन अपनी नई शैली में। आज फैशन और मिथ्याचरण ने हमको हमारे निष्ठ-नैसर्गिक और स्वाभाविक जीवन से अलग-थलग कर दिया है। पशु-पक्षी भी हमारे रूखे व्यवहार से हतप्रभ हैं। गर्भवती गौरैया घोंसला बुनने की उचित जगह न मिलने पर गर्भपात जैसी दर्दनाक समस्या से जूझ रही है। मोबाइल-लैपटॉप स्टेटस ने घर-परिवार की रागात्मकता को सोख लिया है। कामुक पॉप-धुनों और कैटवाक की अधीन सभ्यता छद्म सम्मोहन और वाक् चातुर्य वशीभूत युवा पीढ़ी अपनी ज़मीनी सात्विकता से विमुख हो भटक रही है। विद्यार्थी-गण कॉलेज में जोड़-तोड़ से उत्तीर्ण हो भी गए तो प्रतिस्पर्ध में निराश-निरूपाय हो अपराधवृत्ति का विकल्प चुन रहे हैं। किशोरावस्था में ही दैहिक वर्जनाएँ टूट रही हैं। फैशन के रूप में टेलिविजनी आधुनिकता ने बच्चों पर बुरा असर डाला है। माँ हैरान है- 
 
टॉफी, बिस्कुट, पर्क, बबलगम 
खिला-खिला कर मारी भूख 
माँ भी समझ नहीं पाती है 
कहाँ हो रही भारी चूक 
 
माँ का नेह मनाए हठ को 
लिए कौर में रोटी-साग। 
 
रचनाकार अपने तमाम गीतों में कथित फैशनपरस्ती के बरक्स व्यक्ति में कर्तव्यबोध् को जगाने का प्रयत्न करता दिखाई देता है। ‘बदला अपना लाल’ में ‘समय सुई है’ का सांकेतिक प्रयोग और मिथक के रूप में ‘कबीर’ दोनों मिलकर लक्ष्यार्थ का बोध् कराते हैं- 
 
तकली में अब लगी रुई है 
कात रहा है, समय सुई है 
कबिरा-सा बुनकर बनने में 
लगते कितने साल? 
 
कथित फैशन अब नहीं चलने वाला। यह कवि का आत्मविश्वास है। क्योंकि- ‘लाख-भवन के आर्कषण में/ आखिर लगती आग।’ इस तरह संग्रह के अनेक गीतों में कवि का मनोभाव और विवेक संवादरत है, जैसे ‘मन का तोता’, ‘रस कितना’ और ‘साधे मन को’ आदि गीतों में भावना और बुद्धि का सोद्देश्यात्मक समंजन हुआ है। 
 
रचनाकार की कुछ रचनाएँ हमें उस गहरे बोध् से जोड़ती हैं, जहाँ आधुनिकता अपने वैभव में अहममन्य हो गई है। गौर करें, हिन्दी साहित्य के जितने भी काल खंड- प्रयोगशीलता, प्रगतिशीलता, समकालीनता एवं उत्तरआधुनिकता आदि, आधुनिकता के घटक ही तो हैं। ये सभी घटक उसी-नवजागरण काल से नालबद्ध हैं। किन्तु जरा विचारिये- भूमंडलीकरण आया तो वह उपरोक्त सभी वैचारिक अवधरणाओं को नेस्तनाबूद करने के लिए आया, यानी पूरे साहित्य को खत्म करने के लिए आया। भूमंडलीकरण भी आधुनिकता की ही अवधरणा है। ऐसा आधुनिकतावाद जिसमें पूँजीवाद का वैज्ञानिकीकरण हुआ है। बाज़ार जिसकी आत्मा है और विज्ञापन छोटा भाई। कवि की दृष्टि भूमंडलीकरण के एक-एक अंग पर गई है। उसने हर एक दृश्य का अंतर्मंथन किया है- ‘विज्ञापन की चकाचैंध्, ‘बाज़ार समंदर’, ‘पंच गाँव का’ और ‘उसका खाता’ आदि सृजित वस्तुस्थितियों पर तनिक विचार करें। क्या हमारे देश की आधुनिकता का एक विद्रूप भाग बनकर नहीं रह गया है भूमंडलीकरण? जरा इसकी दबंगई देखिए- 
 
हमें न मँहगाई की चिन्ता 
नहीं कि तुम हो भूखे-प्यासे 
तुमको मतलब है चीजों से 
हमको मतलब है पैसा से 
 
तुम पूरा बाज़ार उठा लो 
उबर न पाओ खर्चों से 
 
सभ्यता तो वर्तमान होती है। संस्कृति उसके सकारात्मक अंशों को स्वीकार कर खुद को परिवर्तित और समृद्ध करती है। यह सिद्धान्त भूमंडलीय औपनिवेशिकता के प्रभाव और दबाव में लगभग टूट चुका है, क्योंकि औपनिवेशिक सभ्यता ने तरह-तरह के कीर्तिमानी प्रलोभनों का जाल फैला दिया है हमारे समाज पर। विश्व के शिखर पर पहुँचने की प्रतियोगिताएँ, देशी ठसक और धमक को घृणा में बदल रहीं हैं। एक गणना के अनुसार पचास प्रतिशत युवा प्रतियोगियों को इस कथित रेस से बाहर कर तनावयुक्त और बीमार कर दिया गया। कई तो आत्महत्या के शिकार भी हुए। इसलिए मेरा समझना है कि वैचारिक स्तर पर हम न गाँधीवादी रहे और न मार्क्सवादी। ऐसे में उत्तर आधुनिकतावाद में बराबरी और सामाजिकता ढूँढना कहाँ की समझदारी है? वहाँ का पूँजीवाद एक व्यक्तिवादी अवधरणा ही नहीं बल्कि व्यक्तिवाद को भी व्यक्तिगत बनाते हुए, उससे काम निकालने की एक शैली बन गया है। अर्थ-शक्ति की हवश ही पूंजीवाद का असलीरूप है। अवनीश के गीतों में उपरोक्त ध्वनित होता है। 
 
ये गीत बोध् कराते हैं कि भूमंडली-तंत्र कैसे-कैसे सूक्ष्म रूपों में हमारे भीतर प्रवेश कर रहा है। यानी हमारी कार्यशैली को हमारे विरुद्ध करके हमारी ही थाती का अवमूल्यन रचा जा रहा है। गाँवों-शहरों में एक अदृश्य कुंठाभाव कहीं घर कर रहा है। गाँव और शहर आमने-सामने होकर खण्डित मानसिकता जी रहे हैं। एक गीत है- ‘गली की धूल’, विसंगति का मार्मिक चित्र। कवि की मनोदशा अचरज में डाल देती है। गाँव से पलायन होकर शहर में आए व्यक्ति ने क्या पाया और क्या गँवाया, का विश्लेषण आसान नहीं है। गीत की अंतर्वीथियाँ हमें दूर-दूर तक ले जाती हैं। पूरा गीत उद्धृत करने योग्य है, यहाँ अन्तिम पंक्तियाँ- 
 
बुढ़ाए दिन, लगे साँसें गवाने में 
शहर से हम भिड़े सर्विस बचाने में 
कहाँ बदलाव ले आया 
शहर है या कि है अजगर? 
 
संग्रह के भीतरी अवलोकनों के बीच-बीच में एक पाठक की उत्कंठा यह जानने की अवश्य रहती है कि यह कवि अपने संग्रह के बाहर कैसा होगा। मेरा मानना है कि समाज का आदर्श वही कवि बनता है जिसका व्यक्तित्व और कृतित्व पारदर्शी हो। व्यक्ति के अंतर्वाह्य जगत को उसकी प्रतिभा ही संतुलित करती है। कहा जाता है कि प्रतिभा व्यक्ति में जन्म के साथ आती है। और परिवेश संस्कारी हो तो साधनाएँ बचपन से ही शुरू हो जाती हैं। सन् 1893 में शिकागो (अमेरिका) में युवा विवेकानंद ने उद्भुत भाषण देकर विश्व में हिन्दुत्व का परचम लहरा दिया था। उन्तीस वर्षीय पी॰बी॰ शैली ने अज्ञात लेखक के रूप में ईश्वर के विरुद्ध हो जाने को आवश्यक मानते हुए एक किताब लिखी और छपवा डाली। महत्वपूर्ण प्रसंग यह है कि उस कृति की ख्याति ने उन्हें ऑक्सफोर्ड से निष्कासित करवा दिया। 15 वर्षीय नेपाली अपने पहले ही कवि सम्मेलन से विख्यात हो गये थे। मंच पर उपस्थित कथा-सम्राट प्रेमचंद्र ने कहा था- ‘बरखुरदार, कविता क्या पेट से सीखकर आए हो।’ यह सब प्रतिभा के ‘चरैवेति’ प्रभाव के अंतर्गत है। जैसे जल-समूह की गत्यात्मक शक्ति धरा फोड़ लेती है, वैसे ही प्रतिभा मील-स्तम्भ बनाती जाती है और आगे चलती चली जाती है। एक और सूत्र कथन याद आ रहा है। डॉ शन्तिसुमन के गीतों पर प्रतिक्रिया व्यक्त करते हुए कभी डॉ विजेन्द्र नारायण सिंह ने कहा था- ‘प्रतिभा की एक पहचान यह है कि वह विकसनशील होती है।’ हमारे प्रिय अवनीश ऐसे ही प्रतिभाशाली कवि-लेखक हैं। एम॰ फिल॰ (अंग्रेज़ी) करते ही मात्र 24 साल की उम्र में एक अंग्रेज़ी किताब (स्वामी विवेकानंद: सिलेक्ट स्पीचेज) लिख डाली, जो परास्नातक पाठ्यक्रम में कई विश्वविद्यालयों में पढ़ी-पढ़ाई गयी। एक विश्वविद्यालय में कार्यरत् अंग्रेजी- प्राध्यापक अवनीश चैहान हिन्दी के क्षेत्र में आए तो मात्र 6-7 साल की अवधि में ही जो भी गद्य-गीत लेखन और संपादन कार्य किया, वह सराहा गया। आजकल वे अनेक छोटी-बड़ी पत्र-पत्रिकाओं में छप रहे हैं। गत 2-3 वर्षों में इण्टरनेट पर ‘पूर्वाभास’ जैसी पत्रिका निकालकर उन्होंने विशेष ख्याति अर्जित की है। हर्ष का विषय ही है कि इस कवि की कार्यशैली विश्वस्तर पर भी सम्मानित/ पुरस्कृत हो चुकी है। साहित्यिक दौड़ में  अभी तो इस धवक ने दशक भी पार नहीं किया किन्तु उसकी कविता का यह वामन रूप मेरे जैसे उम्रदराजों को चकित कर देने के लिए काफी है। इस अवांतर प्रसंग के बाद हम पुनः संग्रह के भीतरी लोक में लौटते हैं। 
 
संग्रह में कतिपय प्रेम-गीत और नदी-गीत भी समायोजित किए गए हैं। नवगीत के कुछ घिसे-पिटे प्रतीक शब्दों में ‘नदी’ भी एक है। नवगीतकारों ने नदी का मानवीकरण किया है। नदी-गीतों में डॉ शिवबहादुर सिंह भदौरिया का गीत सर्वश्रेष्ठ माना गया है- ‘नदी का बहना मुझमें हो’- मेरा स्वभाव नदी जैसा हो जाए। यह स्व से सर्व होना है, सर्ग से निसर्ग होना। व्यक्ति का नदी के रूप में अवतरण अर्थात् बंजर-भूमि, घड़ियाल और गागर आदि सबके लिए समानधर्मा हो जाना है। यही रचनाकार की आंतरिक क्रान्ति है। यह सचेतन जीवन-साधना-सिद्धि है, साधुता है। अवनीश कहते हैं- ‘पंख सभी के छुएँ शिखर को/ प्रभु दे, वह परवाश।’ कवि के नदी-गीत अत्यंत सामाजिक हैं। उसके गीत भी ‘मैं’ शैली में हैं। युगीन विदू्रपताओं से अतिक्रान्त हो, वह भी स्व से सर्व हुआ है। युगीन शोषण से नदी भी नहीं बच पाई। वह प्रदूषित तो हुई ही, सूख भी गई है। कवि स्वयं गल-गल कर नदी की धर बनना चाहता है। एक-दूसरे गीत में कवि को नदी के रूप में सागर (अन्तिम सत्य) को वरण करना है। तो जरूरी है वह तप जो सारे पूर्वाग्रहों से मुक्त करा दे। बड़ी बात है। साहित्य के लिए और मोक्ष के लिए भी। मैंने देखा है कवि को। आचरण में भोले और साधना  में नीलकंठी। द्रवणशीलता उसके संस्कारी गुणों में शामिल है। यदि ऐसा न होता तो ये पंक्तियाँ जेहन में कैसे आ पाती- 
 
नाव चले तो मुझ पर ऐसी 
दोनों तीर मिलाए 
जहाँ-जहाँ पर रेत अड़ी है 
मेरी धार बहाए 
ऊसर-बंजर तक जा-जाकर 
चरण पखार गहूँ मैं। 
 
या 
 
वरण करेंगी कभी सिन्धु का 
पूर्वाग्रह सब तोड़ के। 
 
प्रेम-गीतों को पढ़ लेने के बाद मुझको यह आभास हुआ कि कवि ने बुहत से प्रेम-गीत लिखे होंगे, उनमें से ये पाँच गीत चयनित किए हैं। ऐसा शायद इसलिए हुआ होगा, कि प्रेम-बिम्ब को साधने में प्रायः भंगिमाओं-संवेगों की फिसलन अधिक हुआ करती है, जिससे रचना में हृदय और बुद्धि का संतुलन डगमगा जाया करता है। ऐसा लगता है कि अवनीश ने इस संग्रह में अपनी रचनात्मकता का सर्वोत्तम परोसा है। इन गीतों में उनके कौशल्य और प्रावीण्य का पूरा योग है। 
 
एक रचनाकार अपने भावात्मक, कल्पनात्मक, दृश्यात्मक और ज्ञानात्मक अभिगमों के द्वारा अपनी मूल कथ्यवस्तु को प्रभामंडित करने में जिस भाषा को मेरुदण्ड बनाना चाहता है, उसकी संतुष्टि से ही एक रचना होती है- एक गीत होता है। भाषा ही वह ‘रेसिपी’ है जहाँ अर्थों-भावों के सारे रस अपने में विलीन कर अस्वादन को अद्वितीय बना देती है जैसे मधुमक्खी विभिन्न प्रकार के पुष्प-रसों को मधु में रूपान्तरित कर देती है। गीत के सन्दर्भ में प्रेम की विविध् परिभाषाएँ हैं। उन सभी को जेहन में रखते हुए मैं कहना चाहूँगा कि प्रेम और ईश्वर एक ही सिक्के के दो पहलू हैं। दोनों का केन्द्र है गीत-सृष्टि। डॉ सुरेश गौतम का सूत्र कथन है- ‘गीत (प्रेम) अध्यात्म है, तपश्चर्या है। गीत नीलकंठी द्रव है’। 
 
दुनिया में दो ही अस्तित्व ऐसे हैं जिनका साहित्य सर्वोपरि है। एक है ईश्वर और दूसरा प्रेम। दोनों अव्यक्त हैं। दोनों का साहित्य आज तक पूर्णता को प्राप्त नहीं हो सका। दोनों ‘शायद’ पर अवलम्बित हैं। प्रेम में गहरे डूबे हुए किसी प्रेमी से पूछो- ‘आप ने प्रेम को जान लिया? उसका उत्तर होगा- ‘शायद’। स्यात्वाद के प्रवर्तक भगवान बुद्ध से पूछा गया- ‘क्या ईश्वर है?’ उनका उत्तर था- ‘शायद’। अवनीश के पाँच प्रेम-गीतों का संचारी भाव प्रकृत है, तथापि ये गीत श्रेष्ठ हैं। कई गहनतम हैं, जहाँ दृश्य और द्रष्टा अभेद्य हो जाते हैं। शायद प्रेम की गहनतम अनुभूति का रस उन्होंने चख लिया है। ‘एक आदिम नाच’ का तो यही संकेत है- 
 
एक स्मित रेख तेरी 
आ बसी जब से दृगों में 
हर दिशा तू ही दिखे है 
बाग़-वृक्षों में, खगों में 
 
दर्पणों के सामने जो बिम्ब हूँ 
वो मैं नहीं- कादम्बरी तू! 
 
मेरी राय में ऐसे गीत व्याख्यातीत होते हैं। यहाँ यह भी स्मरण में रखना होगा कि कवि अपने गीतों में जिस विराट-बिम्ब और मानवीय चेतना की बात उठाता है उन सब का मूलाधर उसकी प्रेम-शक्ति ही है। 
 
कृति के अवगाहन में विविध् कथ्यालोकों ने मुझे अप्रत्याशित रूप से प्रभावित किया है। उन सबों पर बात होनी चाहिए। पर यह सब एक भूमिका लेख में संभव नहीं। विस्तार पर अकुंश और ज्वलंत समस्याओं को केन्द्र में रखने के उपरांत अनेक महत्वपूर्ण गीत छूट रहे हैं। गीत जो ऋतुओं, त्योहारों और रिश्तों की रागात्मक और आत्मीय ऊष्मा-ऊर्जा से आप्लावित हैं, सभी नवोन्मेषी हैं। सभी गीतों में अद्भुत विम्बधर्मिता है। ‘पत्थर-सी रोटी’, ‘समय सुई है’, ‘बाज़ार-समंदर’, ‘सपनों की पैंजनिया’, ‘सूरज एक चुकन्दर’, ‘छल की गाँठ’, ‘सुहागिन का टोना’, ‘पोटली का मोती’, ‘खुशियों की क्रीम’ और ‘दुःखों का दही विलोना’ जैसे प्रयोगों की द्युति इन गीतों की प्राणशक्ति बन गई है। 
 
आज वैश्विक पटल पर बड़े सर्जकों की जो चिंताएँ हैं उनसे अलग नहीं हैं चिताएँ जो इन गीतों में उठाई गई हैं। इसके बावजूद शिल्प-शैली में सबसे अलग होकर स्वनिर्मित मार्ग पर चला है कवि। कॉमन लय और कॉमन कथ्य से समझौता न करते हुए मौलिक और परिपक्व दृष्टि के परिचायक हैं ये गीत। लोक तथा जन और प्रगतिशील भाषा का समन्वय भाव है कवि का भाषा-मुहावरा। उसका प्रयत्न श्लाघनीय है। यह प्रयत्न सायास न होकर अनायास ही है, जैसे अनायास होती है बच्चों की सोच। उनकी सोच में संसार अपेक्षाकृत सहायक नहीं बन पाता। बाल्यावस्था संसारिकता से अनभिज्ञ होती है। साहित्य के क्षेत्रा में एक युवा रचनाकार की यही स्थिति होती है। हालांकि संग्रहीत गीत, कवि की अध्ययनशीलता एवं चिन्तन-मनन के द्योतक हैं। परिवेश को उसने भी खुली आँखों से देखा, भुगता है। पर इनमें साहित्य का छाद्मिक चातुर्य नहीं, निर्दोष मन की झलक है। यही झलक पाठकों की दिलचस्पी बनेगी। वैसी ही दिलचस्पी जैसे कभी गाते हुए ‘सॉलिटरी रीपर’ को सुनने के लिए ठिठक कर खड़े हो गये थे कवि विलियम वर्ड्सवर्थ। 
 
एक बात और कहना चाहूँगा कि गीत रचना शब्दों की मितव्ययी होती है। अवनीश चैहान के गीत इस तथ्य के प्रमाण हैं। आकार-प्रकार में छोटे-छोटे अर्थ गुंजलक हैं ये। संख्या भी बहुत कम, मात्रा 44 तक ही पहुँच पाती है। आपको ये सारे अर्थ-गुंजलक लघुता में विराटता का बोध् कराने वाले लगेंगे। वस्तु यदि सघन होकर केन्द्रित होगी तो उसकी अर्थ-वीथियाँ हमें दूर-सुदूर तक ले जाएंगी। निम्न उदाहरण से उक्त कथन ज्यादा स्पष्ट होगा- ‘ग़रीबी में जुड़े थे सब / तरक्की ने किया बेघर।’ 
 
आज तेजी से दुनिया बदल रही है। शब्द संकट भी गहरा रहा है। चुनौतियाँ भी कम नहीं हैं। सभी का विकल्प एक ही है। नई-नई सर्जना हो, उसकी स्थापना हो। आलेख की शुरुआत में डॉ विमल की नई स्थापनाओं का उल्लेख हुआ है। वैसा साहस हमारा समस्त बुद्धिजीवी समाज दिखा सके तभी ‘टुकड़ा कागज़ का’ जैसी समर्थ कृतियों की वास्तविक सार्थकता सिद्ध हो सकेगी। 
 
मेरा मानना है कि साहित्य में भावुक सत्य ही साहित्य की मौलिक उद्भावना होती है। मेरा यह भी मानना है कि किसी युवा मन का प्रारम्भिक शब्द-श्रम और तपश्चरण उसके भावोत्कर्ष की परिणति होती है। अतः ऐसे शब्द-साधक को अग्रजों-आचार्यों का वरदीय नेहाशीष मिलना ही चाहिए। विश्वास है कि ‘टुकड़ा कागज़ का’ का प्रकाशन हिन्दी साहित्य के क्षितिज पर अपनी सूर्योदयी भूमिका निभाएगा। बस इतना ही। 
पुस्तक: टुकड़ा कागज़ का 
              (गीत-संग्रह) 
ISBN 978-81-89022-27-6
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष: प्रथम संस्करण-2013 
पृष्ठ : 119
मूल्य: रुo 125/-
प्रकाशक: विश्व पुस्तक प्रकाशन  
304-ए,बी.जी.-7, पश्चिम विहार,
नई दिल्ली-63 
वितरक: पूर्वाभास प्रकाशन
चंदपुरा (निहाल सिंह, 
इटावा-206127(उ प्र) 
दूरभाष: 09456011560
ई-मेल: abnishsinghchauhan
@gmail.com  


पुस्तक: टुकड़ा कागज़ का (गीत-संग्रह) 
ISBN 978-93-83878-93-2
कवि: अवनीश सिंह चौहान 
प्रकाशन वर्ष: द्वितीय संस्करण -2014 (पेपरबैक)
पृष्ठ : 116
मूल्य: रुo 90/-
प्रकाशक: बोधि प्रकाशन, जयपुर
Phone: 0141-2503989, 09829018087
 
Book: Tukda Kagaz Ka (Hindi Lyrics)
ISBN 9978-93-83878-93-2
Author: Abnish Singh Chauhan
First Edition: 2014 (Paperback)
Price: 90/-
Publisher: Bodhi rakashan, 
Jaipur, Raj, India.

 
 
वीरेन्द्र आस्तिक 
एल-60, गंगा बिहार 
 
 
 

Tags: Tukda Kagaz Ka,  Dr Abnish Singh Abnish Singh Chauhan Hindi Literature Poetry Poets, Novelists, Writer 

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