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Higher Education and Research

 

 

 

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नवगीत के उन्नायक दिनेश सिंह (Part B)— अवनीश सिंह चौहान

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dinesh-singh-2-2विलियम शेक्सपीयर ने कभी कहा था कि सुंदर विचार जिनके साथ होते हैं, वे कभी अकेले नहीं होते। ऐसा ही कुछ इधर भी दिखायी पड़ रहा है, देखिये—  

 

लगा खिड़की से सटी

चुपचाप

गीतांजलि खड़ी है

और चारों ओर

बिखरी हैं हजारों पुस्तकें। — शलभ श्रीराम सिंह

 

पारंपरिक प्रणयधर्मी गीतों पर हजारों पुस्तकें लिखी गयी हैं और उन पर शलभ श्रीराम सिंह की उपर्युक्त टिप्पणी काफी सटीक बैठती है। किंतु दिनेश सिंह के गीत-संग्रह— 'टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर' को पढ़ने पर लगता है कि गीतांजलि स्वयं इस पुस्तक को उठाकर इसमें अपना चेहरा देखने का प्रयास कर रही है, ऐसी स्थिति में निश्चय ही यह गीत संग्रह उन हजारों पुस्तकों में अनूठा है। दिनेश जी भावाकुल मन की बात, प्रेम के पवित्र प्रवाह तथा उसके आधुनिक चलन को कहने के बहुत से तरीके जानते हैं, उनको इन रागबंधों से जुड़े जीवन और परिवेश की गहरी समझ है और इस विषयवस्तु को मूर्त रूप देने के लिए जिस प्रविधि का वह प्रयोग करते हैं, उससे लगता है कि वह प्रेमगीत परंपरा एवं प्रयोग को भी भली-भाँति जानते रहे हैं। इसीलिए प्रेम-भाव की चरम तन्मयता में उन्होंने अपनी रागात्मक अनुभूतियों को इस काव्यकृति में बखूबी गाया है और अपनी प्रेम-लड़ियों को सामाजिक-सांस्कृतिक सरोकारों से जोड़कर तथा आम-भाषा एवं सहज-संगीत में पिरोकर प्रणयधर्मी गीत साहित्य को और अधिक विस्तृत फलक प्रदान किया हे। इस दृष्टि से 'टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर' की समीक्षा में ख्यात कलमकार नीलम श्रीवास्तव का कहना है— "अपने देश में आज की सामाजिक संचेतना की कविताएँ दरअसल सारी धरती पर उग आये विषवृक्षों की सफाई का अभियान चला रही हैं ताकि उस पर प्रेम की फसल उग सके। उस फसल की नर्सरी दिनेश सिंह के गीतों में मिल जाती है" ('समर करते हुए', पृ 120)। 

 

चोहत्तर गीतों से सुसज्जित इस गीत-कलश पर नायिका-भेद तथा नख-शिख वर्णन कर किसी प्रेयसी की भाव-भंगिमाओं को नहीं उकेरा गया है, बल्कि लीक से हटकर प्रेमी की मनोदशा, संवेदना का आवर्तन एवं प्रेम से संदर्भित उसके अनुभवजन्य दृष्टिकोण का यथार्थपरक एवं सटीक चित्रण किया गया है। ऐसा चित्रण अंग्रेजी साहित्य में रॉबर्ट ब्राउनिंग के 'ड्रामेटिक मोनोलॉग्स' में देखने को मिलता है, जिसमें प्रेम के सारे कार्य-व्यापार नायक के मानस-पटल पर ही होते हैं और उसके इन मनोभावों से पाठक का सीधा परिचय बनता है। कवि (दिनेश सिंह) द्वारा अपनी इस कृति में प्रेमी के मानसिक स्तर पर उतरकर प्रेम के विविध रंगों को इतनी बेबाकी से प्रस्तुत करना श्लाघनीय है— कभी वह प्रेम में डूबकर प्रणयी दिल की व्याकुलता को प्रकट करता है, तो कभी प्रकृति से प्रेरित उसके मन की उत्कण्ठा एवं उल्लास को व्यक्त करने लगता है; कभी वह 'राग और आग' की भट्टी में तपने लगता है— "एक राग/ एक आग/ सुलगाई है भीतर/ रातों भर जाग-जाग/ हम लंगड़े-लूले/ फिर कदम्ब फूले" और "वत्सल-सी,/ थिरजल-सी/ एक सुधि बिछी भीतर/ हरी दूब मखमल-सी/ कोई तो छूले/ फिर कदम्ब फूले।" उसकी यह मनोकामना किसी क्षणिक आवेग से प्रेरित नहीं है, बल्कि इसके पीछे भी एक आधारभूत कारण है— "पिया कहाँ?/ हिया कहाँ/ पूछे तुलसी-चौरा/ बाती बिन दिया कहाँ/ हम सब कुछ भूले/ फिर कदम्ब फूले" (टेढ़े-मेढ़े ढाई आखर, पृ. 13), बाती का दिया से जो अटूट रिश्ता है उसी को प्रेमी-युगल के मध्य प्रकट कर कवि प्रेम के मर्यादित स्वरूप की पुष्टि करता है। इसका आशय यह कि कवि प्रेम की मूलभूत संवेदना एवं संस्कार को सँजोये-सँवारे रखकर प्रीति की निर्मल-धारा को सतत प्रवाहित देखना चाहता है, जिससे इस स्वस्थ एवं सुंदर कला के माध्यम से जीवन को सार्थक बनाया जा सके— "कोई बिछुआ रुनझुन-रुनझुन बोले/ घूँघट पट कोई विव्हल मन खोले/ आवेग जगाए छंद-सृजन की लय/ घर भर में शिशु की किलकारी डोले/ करने को इतना भर होता/ जीने का अर्थ मुखर होता" (पृ. 22)। यहाँ पर ललित आलोचक डॉ सुरेश गौतम द्वारा 'काव्य परिदृश्य : अर्द्धशती (पुनर्मूल्यांकन) : खण्ड-2' में दिनेश सिंह के रचनाकर्म पर की गई टिप्पणी उद्धृत करना चाहूँगा— "अंचलीय लोक-तात्विकता के रस में नहाकर शब्द-तंत्र अर्थ-सौंदर्य की अनेक परतों को कोमलकृशी नववधू के घूंघट की तरह खोलता है। अर्थ सौंदर्य के दिपदिपाते बांक-सौंदर्य में घूंघट का सलोनापन बाँधने वाला है” (पृ. 409)।

 

मार्मिक एवं प्रभावी अभिव्यक्ति और बिंबात्मक प्रस्तुति के माध्यम से 'टेढ़े मेढ़े ढाई आखर' के तमाम गीतों— 'फिर कदम्ब फूले', 'ओ रे मेरे मन', 'नाव का दर्द', 'ओ रे पिया',  'अकेला रह गया', 'तुम्हारे बाद जाने के', 'क्या कहूँ', 'तेरे बिना', 'प्रिया-प्रिया रटते-रटते', 'हम तुम', 'कहाँ महकाओगे', 'स्वप्न देखने वालो', 'उल्टे दिन हुए', 'बहुत मुश्किल', 'सुख की चिन्ताएँ', 'चिड़े की व्यथा' आदि में कविवर दिनेश सिंह प्रेम की उद्दात्ता को जिस प्रकार से गीतायित करते हैं, उससे प्रेम की गहराई, पवित्रता एवं गरिमा तो प्रदर्शित होती ही है, वर्तमान में प्रेम की प्रचलित प्रणालियों के चलते प्रेम-मूल्यों में आयी गिरावट भी व्यंजित होती चलती है। इस बात को दिनेश सिंह कुछ इस प्रकार से कहते हैं— "काठ की तरह कठियाये कविता-समय में हवा की तरह भागती आज की जिंदगी हर पुरानी चीजों से टकराती फिर रही है और उन्हें नष्ट कर रही है, जिसमें सबसे अधिक मानवीय आवेग ही चुटहिल हुए हैं। उन चोटों के निशान भी इन गीतों में देखे जा सकते हैं, जबकि मन के उदात्त आवेग का मौसम ढल रहा हो और वस्तुपरकता की नई चाहतों ने दिल के लिए मरने-मिटने की चाहत को दबाया हो" (सन्दर्भ, पृ. 9)। वास्तव में अब प्रेम-सम्बन्धी स्थितियाँ काफी-कुछ बदल गयीं हैं। बाजारवाद एवं विज्ञापनवाद की लहर में प्रेम भी व्यापारिक अनुबंधों की भेंट चढ गया है, जिससे प्रणय-सन्दर्भ में आस्था, विश्वास एवं समर्पण की संवेदना खण्डित हो रही है—

 

प्रिया-प्रिया रटते-रटते ही/ खोये रहे खयालों में 

खुली हवा की नई सुर्खियाँ/ चढ़ी प्रिया के गालों में 

 

कंचन काया की नादानी/ और विपाशा भीतर की

कई निगाहों में बस जाने की/ प्रत्याशा भीतर की

जीने की लय बनकर आई/ स्वयं समय की चालों में। (पृ. 41)

 

और रस, अलंकार, वक्रोक्ति, ध्वनि के माध्यम से समकालीन स्थितियों पर कटाक्ष करता यह बंध भी प्रस्तुत है— 

 

नये समय की चिड़िया चहकी/ बहकी हवा/ बजे मीठे स्वर 

सारंगी के तारों जैसी/ काँप रही/ जज्बातों की लर 

 

छुप-छुपकर मिलती रहती है/ अपने दूजे खसम-यार से

बचे समय में मुझसे मिलती/ गलबाहें दे बड़े प्यार से

उससे लेती छाँह देह की/ मुझसे लेती ढाई आखर। (पृ. 101)

 

वर्तमान समय के ऐसे प्रेमियों के चारित्रिक एवं नैतिक पतन से प्रेम की गरिमा धूल-धूसरित हुई है। इसका मुख्य कारण आज की अतिभौतिक मानसिकता ही है जिसमें चमड़ी और दमड़ी का व्यापार बड़ा चोखा माना जाता है। शायद इसीलिये ऐसे प्रेमी बिकने-बिकाने, खरीदने-बेचनें में ही विश्वास रखते हैं और मुनाफा कमाने की तरकीबें भिड़ाते हैं— "यों कि बिकने और लुटने के लिए/ खाली कसम" और "उस तरह सीखा/ सनम से प्यार करना/ जिस तरह सीखा/ खुला व्यापार करना", ऐसे में उनके लिए सच्चे प्यार के माने कुछ नहीं। चूँकि व्यापार में झूठ और अवसरवादिता का बड़ा महत्व है— "अवसरों में ही सभी जीते यहाँ", एक सच्चा प्रणयी दिल इस व्यापार में कदापि टिक नहीं सकता— "मेरे पास झूठ की पूँजी तनिक नहीं/ कैसे टिक पाऊँगा मैं व्यापार में।" यानी कि आजकल प्रेम में छल और धोखे का प्रयोग हो रहा है और खोखले मीठे बोलों का भी— "सही बोल दिल के दिल में रहे/ ओंठों पर चासनी चढ़ा लिया" और "गढ़ रही सच्चाइयाँ धोखा/ और धोखे से मिले दो दिल/....बन गये हैं प्यार के काबिल।" अब ऐसे प्रेमी यह भी मानते हैं कि अब समय नहीं "उस प्यार का/ जो कि दीवाना बना दे", बल्कि अब "जमाना है पास आते आदमी को/ तूल देकर तूलने की" — इसी को प्रेम करने एवं प्यार पाने का 'शॉर्टकट' माना जाने लगा है। इसीलिये अब यह बात बहुत मायने नहीं रखती है कि इस दिखावे में कितनी हकीकत है और कितना फसाना— "यहाँ दिखावे की हद तक सब आते हैं/ पर्दे के पीछे असलियत छिपाये हैं/ भीतर-बाहर से गँधाते तन-मन को/ खुशबू के हम्मामों में नहलायें हैं।" इस बनावटी खुशबू में ऐसे प्रेमी मधहोश हो गये हैं और जो प्रेमी ऐसा नहीं हो पाते या कर पाते, "वे बदनाम हैं" और असफल भी। यह नयी सोच की, नये ढंग की, नये प्यार की, नयी उड़ान किसको कितना आतंकित करती है और किसको कितनी राहत देती है, यह उसके व्यक्तिगत स्वभाव एवं संवेदना पर निर्भर करता है। निष्कर्षतय: कहा जा सकता है कि बच्चन, अंचल, नेपाली, रमानाथ अवस्थी, भारतभूषण, नीरज, शम्भुनाथ सिंह, ठाकुर प्रसाद सिंह, शिवबहादुर सिंह भदौरिया, रवीन्द्र भ्रमर, ओम प्रभाकर, सोम ठाकुर, कैलाश गौतम, किशन सरोज, नचिकेता, वीरेन्द्र आस्तिक, बुद्धिनाथ मिश्र, मधुकर गौड़, श्याम निर्मम, शतदल, कुँवर बेचैन आदि द्वारा पल्लवित और पोषित प्रेम-गीतों की लंबी परंपरा को "आधुनिक जीवनबोध को केन्द्र में रखकर बदली हुई प्रणयी भंगिमाओं" (सन्दर्भ, पृ 10) के माध्यम से समृद्ध करता यह गीत संग्रह जरूरी रूप से पठनीय एवं संग्रहणीय है।

 

(8)

 

प्रेम के आधुनिक सन्दर्भों के प्रति सजग रहते हुए अब हमें दिनेश सिंह की एक और महत्वपूर्ण कृति— ‘समर करते हुए!' (नवगीत संग्रह, 2003) की ओर भी बढ़ना होगा। कथ्यगत एवं शिल्पगत नवीनता एवं परिपक्वता से लैस बयासी नवगीतों के इस संग्रह में कवि कलम के प्रयोग एवं बुद्धि कौशल के बल पर अदम्य साहस एवं अटूट विश्वास से परिपूर्ण होकर, उन सभी विडंबनापूर्ण स्थितियों एवं असंगत तत्वों से, जोकि समय के साँचे में अपना आकार लेकर मानवीय पीड़ा का सबब बनी हुई हैं, युद्धरत दिखाई पड़ता है। लगता है कि विराट जीवनानुभवों से समृद्ध ये रचनाएँ अपनी जगह से हटतीं-टूटतीं चीजों और मानवीय चेतना एवं स्वभाव पर भारी पड़ते समय के तेज झटकों को चिन्हित कर उनका प्रतिरोध करने तथा इससे उपजे कोलाहल एवं क्रंदन के स्वरों को न्यूनाधिक कम करने हेतु नये विकल्पों को तलाशने के लिए महासमर में जूझ रही हैं— "व्यूह से तो निकलना ही है/ समर करते हुए/ रण में बसर करते हुए।/ हाथ की तलवार में/ बाँधे कलम/ लोहित सियाही/ सियासत की चाल चलते/ बुद्धि कौशल के सिपाही/ जहर-सा चढ़ते गढ़े जजबे/ असर करते हुए/ रण में बसर करते हुए" (पृ. 114)।

 

वैश्विक-फलक पर तेजी से बदलती मानवीय प्रवृत्तियों एवं सामाजिक सरोकारों के नवीन खाँचों को रेखांकित करते इन नवगीतों में जहाँ एक ओर नए बोध के साथ जीवन-जगत के विविध आयाम अभिव्यक्त हुए हैं, वहीं आहत मानवता को राहत पहुचाने और उसके कल्याण हेतु सार्थक प्रयास करने की मंशा भी उजागर हुई है। इस अनूठी भाव-धारा को गति देता यह नवगीतकार भारतीय लोक-जीवन के कटु यथार्थ से अवगत ही नहीं कराता, बल्कि समय के साथ उपजी विसंगतियों के प्रत्यक्ष खतरों का डटकर मुकाबला करने की हिम्मत भी देता है, यथा— "धार अपनी माँजकर/ बारीक करना तार-सा/ निकल जाना है/ सुई की नोक के उस पार-सा/ जिंदगी जी जाएगी/ इतना सफर करते हुए/ रण में बसर करते हुए।" महत्वपूर्ण बात यह है कि जिंदगी जीने के लिए किया जाने वाला यह 'सफर' संचार संसाधनों से संपन्न इस युग में ही तय करना है। लेकिन इसके कुछ खतरे भी हैं— संचार क्रांति के इस युग में जहाँ भौगोलिक दूरियाँ घटी हैं और एक मिली-जुली संस्कृति का उदय हुआ है, वहीं अर्थलिप्सा, ऐन्द्रिय सुख एवं आपसी प्रतिस्पर्धा की भावना में भी बड़ा उछाल आया है। इन्हीं उछालों के असंतुलन से जीवन मूल्यों में जबरदस्त टूटन देखने में आयी है, जिससे आपसी प्रेम संबंध तार-तार हो रहे हैं। यद्यपि कुछ आशाएँ-प्रत्याशाएँ अब भी शेष हैं, जिन्हें कवि अपनी सहृदयता, सहजता एवं वात्सल्य से कुछ इस प्रकार से व्यंजित कर रहा है—

 

वैश्विक फलक पर/ गीत की संवेदना है अनमनी

तुम लौट जाओ/ प्यार के संसार से मायाधनी

 

यह प्रेम वह व्यवहार है/ जो जीत माने हार को

तलवार की भी धार पर/ चलना सिखा दे यार को

हो जाए पूरी चेतना/ इस पंथ की अनुगामिनी। (पृ. 14)

 

भौतिकता एवं पाशविकता के कारण व्यापक स्तर पर उपजी संवेदनहीनता की रोकथाम एवं उपचार करने के लिए प्रेम की जिस संजीवनी का प्रयोग करने की बात यह कवि करता है, उससे इस समर में बसर करने की आस तो बँधती ही है, इससे समय की विषयाग्नि से निःसृत नए दुःखों से पार भी पाया जा सकता है— "सिर पर/ सुख के बादल छाए/ दुःख नए तरीके से आए।/ सुविधाओं की अँगनाई में/ मन कितने ऊबे-ऊबे हैं/ तरुणाई के ज्वालामुख,/ लावे बीच हलक तक डूबे हैं/ यह समय/ आग का दरिया है/ हम उसके माँझी कहलाए/ दुःख नए तरीके से आए।" परिणामस्वरूप आज की पीढ़ी की मानसिकता में आए इस जबरदस्त बदलाव का आलम यह है कि साधन-संपन्नता के बावजूद भी उसके मन में असंतोष की गाँठें उभरती रहती हैं जिसके चलते वह जमाने की चमक-दमक से आकर्षित होकर नित नयी महत्वाकांक्षाएँ पालने-पोसने में लगा रहता है और जब इनको पूरा करने में वह सफल नहीं हो पाता तब उसकी स्थिति बड़ी ही दयनीय हो जाती है— "कई रंग के फूल बने काँटे खिल के/ नयी नस्ल के नये नमूने बेदिल के।/ आड़ी-तिरछी-टेढ़ी चालें/ पहने नयी-नयी सब खालें/ परत-दर-परत हैं पंखुरियों के छिलके।/ फूले नये-नये मिजाज में/ एक अकेले के समाज में/ मेले में अरघान मचाए हैं पिलके।/ भीतर-भीतर ठनाठनी है/ नोंक-झोंक है, तनातनी है/ एक शाख पर झूला करते हिलमिल के।/ व्यर्थ लगें अब फूल पुराने/ हल्की खुशबू के दीवाने/ मन में लहका करते थे हर महफिल के" (पृ. 17)। 

आज की भागदौड़-भरी जिंदगी में बाजारवाद की जकड़न, भौतिक महत्वाकांक्षाओं से सामाजिक मूल्यों का विघटन, राजनीति में जीवन-मूल्यों का अवमूल्यन, नैतिक आदर्श की भावना का स्खलन, जीवन की रागात्मक अभिव्यक्ति में असंतुलन आदि के चलते देश-दुनिया की स्थिति बिगड़ रही है। इस सन्दर्भ में दिनेश सिंह की 'समर करते हुए' में दी गयी टिप्पणी महत्वपूर्ण है— "इस बेसुरे कविता-समय में मनुष्य-जीवन की वस्तुपरकता देश-काल को जो धरोहर-पूँजी के रूप में धरने को दे रही है उसके बूते अगली पीढ़ी को वैभव का पाठ पढ़ाने के अलावा सामाजिक राग का कोई मानवीय अध्याय खोलते नहीं बन रहा है। इस नयी संस्कृति का भाव इस देश की सुपरिचित सांस्कृतिक भाव-लय से मेल नहीं खा रहा है। ऐसी कठिन परिस्थिति में हिंदी गीत की साहित्यिक और सांस्कृतिक सीमाओं और संभावनाओं के संकेतों को इन गीतों में तलाशने का काम मैं अपने सुधी पाठकों पर ही छोड़ता हूँ" (प्रसंग, पृ. 10-11)।

 

नए समीकरणों के बीच वर्तमान जीवन के मर्म को निरखने-परखने वाली दिनेश सिंह की गीतधर्मिता में जिन तत्वों का समावेश हुआ है वे तर्क के सीमेंट एवं यथार्थ के मौरंग से बड़ी वस्तुनिष्ठता एवं स्वाभाविक भावबोध के साथ खुद के गढ़े गए प्रतीकों-बिंबों के माध्यम से रूपायित होते हैं। इन रचनाओं में समय के सच की जितनी सहज अभिव्यक्तियाँ हैं, गहराई में उतरने पर बौद्धिक आयामों के कपाट भी उतने ही स्पष्ट रूप से खुलते चले जाते हैं— 

 

दर्द दिल में हर समय धड़का करे

हमें कुछ ऊपर उठाकर

 

ओंठ सच के बहुत मुखरित हो रहे

मुँह लगाए हुए बाकी टाकियाँ

वार्ताओं-मशविरों की आड़ में

झूठ का मुँह कुचलती चालाकियाँ

 

वैभवों के पाप बदले पुण्य में

विभव का सागर नहाकर। (पृ. 24)

 

इस नवगीत संग्रह में व्यावहारिक भाषा-लय को पकड़कर आधुनिक जीवन के तानों-बानों को कभी सीधे सहज रूप में तो कभी वक्रता के साथ करीने से व्यंजित किया गया है। जीवन की संश्लिष्टता तथा अडिग आस्था का निरूपण करते इन गीतों की आंतरिक अन्विति तथा उसको-उकेरने उभारने हेतु अद्भुत दृष्य संयोजनों में इस प्रयोगधर्मी कवि की संवेदना को कोई भी सहयात्री आसानी से महसूस कर सकता है। कहने का आशय यह भी कि विचारों की मौलिकता, अछूते बिम्बों का सटीक प्रयोग, लोकजीवन की सहज अनुभूतियाँ, जीवन-मूल्यों की सार्थक पड़ताल, विज्ञान बोध की व्याप्ति, शिल्प का वैविध्य, भाषा का टटकापन, सहज सम्प्रेषणीयता, जनधर्मी चेतना आदि तत्वों से आलोकित इस नवगीत-संग्रह को नयी दृष्टि से देखने-परखने की आवश्यकता है।

 

(9)

 

दिनेश सिंह भलीभाँति जानते थे कि मनुष्य को अपने जीवन में उच्चतम विकास करने के लिए निरंतर संघर्ष करना पड़ता है। संघर्ष यूँ ही नहीं हो जाता, उसके लिए मनुष्य को अपनी भूमिका तय करनी होती है— कई बार संघर्ष स्वयं मनुष्य की भूमिका तय कर देता है। शायद इसीलिये उमंगों एवं उम्मीदों के ब्रह्म-कमल पर अपनी मस्ती में विराजमान अद्भुत गीतकार दिनेश सिंह जीवन-पर्यन्त संघर्ष करने से कभी नहीं कतराए, जिसके प्रमाण के रूप में बयासी नवगीतों को समोये उनकी चौथी काव्य पुस्तक— 'मैं फिर से गाऊँगा' (2009), जिसकी अधिकांश रचनाओं की सर्जना दिनेश सिंह की दूसरी कृति के प्रकाशन के बहुत पहले की गयी थी, के शीर्षक गीत की ये पंक्तियाँ दृष्टव्य हैं—

 

मैं फिर से गाऊँगा

बचपना बुलाऊँगा/ घिसटूँगा घुटनों के बल/ 

आँगन से चल कर/ लौट-पौट आँगन में आऊँगा।

मैं फिर से गाऊँगा। 

 

पोखर में पानी है/ पानी में मछली है 

मछली के ओंठों में प्यास है 

मेरे भीतर/ कोई जिंदगी कि फूल कोई 

या कोई टूटा विश्वास है 

 

कागज की नाव/ फिर बनाऊँगा  

पोखर में नाव कहाँ जायेगी 

लेकिन कुछ दूर तो चलाऊँगा। 

मैं फिर से गाऊँगा। (पृ 11-12)

 

(10)

 

हिंदी-काव्य एवं आलोचना की धरा पर आलोकधर्मी अग्निलीक खींचने वाले दिनेश सिंह किशोर होते ही कवि हुए, प्रौढ़ होते ही कवि, आलोचक एवं संपादक हुए और जीवन-पर्यन्त कवि, आलोचक एवं संपादक ही बने रहे— वह साहित्य और जीवन को एक दूसरे को पर्याय मानकर जीवन-भर उस सत्य की खोज में लगे रहे, जिसे उपनिषदों में 'नेति-नेति' कहकर शब्दबद्ध करने का प्रयत्न किया गया। सहज-सौम्य-सुबोध दिनेश जी ने तत्कालीन शहर-गाँव-समाज में हो रहे आमूल-चूल परिवर्तनों, फ़ैल रहीं असंगतियों-अव्यवस्थाओं, बढ़ रहीं चिंताओं-मलामतों को बखूबी जान-समझ कर बड़ी साफगोई से अपने साहित्य-संसार को रचा है। शायद इसीलिये उन्होंने सदैव अपनी कविताओं, कहानियों, गीतों, नवगीतों आदि में ही नहीं, बल्कि आलोचना एवं संपादन में भी 'असत्य-अशिव-असुंदर' का पुरजोर विरोध किया है और सत्य, अहिंसा, प्रेम, विवेक, ज्ञान, संयम, सदाचार, उदारता, आस्था, शांति एवं अनुशासन का सार्थक पाठ पढ़ाया है— कई बार अपनी चिंतनपरक आतंरिक यात्रा से तो कई बार पारदर्शी एवं निष्कलुष जीवन-शैली से; कई बार अपने अर्थ दृष्टि से समृद्ध व्यावहारिक शब्दों से तो कई बार अपने उदग्र, उदात्त टेढ़े-मेढ़े ढाई आखरों से— क्योंकि यही सब कुछ तो 'जीने का अर्थ मुखर' कर देते हैं। शायद इसीलिए डॉ वीरेंद्र सिंह ने अपनी आलोच्य पुस्तक— 'समकालीन गीत : अन्तः अनुशासनीय विवेचन' (2009) में दिनेश सिंह के साहित्यिक अवदान को करीने से रेखांकित किया है। 

 

(11)

 

इस सृष्टि में जीवन (सृजन) और मृत्यु (विलय)— दोनों काल के आधीन हैं। काल एक व्यापक सत्ता है— जीवन से लेकर मृत्यु तक की तमाम अवस्थाएँ इसी में अपना आकर ग्रहण करती हैं। इसलिए दोनों ही सत्य हैं और दोनों ही महत्वपूर्ण हैं। अनूठी कहन और बेबाक शैली के लिए ख्यात दिनेश सिंह भी अपने एक गीत में यही कहते हैं— "काल है/ जो साथ चलता है/ मृत्यु तक/ जीवित क्षणों में।" इस स्थिति के प्रकाश में ज्येष्ठ पूर्णिमा के दिन 2 जुलाई 2012 को मुक्तचेता दिनेश सिंह का अपने गाँव में ही गोलोकवास हो गया। उनके पार्थिव शरीर को गंगा जी के तट पर स्थित गेगासो घाट ले जाया गया— "जब उनके पार्थिव शरीर को गेगासों घाट पर आग दी गयी तो वे बिल्कुल अकेले थे। मुझे आश्चर्य हुआ कि पूरे समय, जब तक कि वे भस्म में नहीं बदल गये, कोई दूसरा शव नहीं आया। वर्ना तो शमशान में शवों की भीड़ ही लगी रहती है। और जैसे ही हमलोग दिनेश सिंह की अस्थियों को गंगा में विसर्जित कर चुके वैसे ही दूसरा शव शमशान में आता हुआ दिखाई दिया। मुझे लगा कि प्रकृति ने अंत समय में उनके सम्मान का पूरा ख़याल रखा। वे अपने सम्मान, स्वाभिमान में सदा ही अकेले रहे और अंतिम समय भी वह 'हंस अकेला' वैसे ही उड़ चला— अपने पीछे साहित्य की समृद्धि, गीतों की भरपूर गुनगुनाहट और व्यक्तित्व की आकर्षक यादों को छोड़ता हुआ" (रमाकांत, दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक, पृ 5)। दिनेश सिंह के दिवंगत होने पर भोपाल के वरिष्ठ साहित्यकार राम अधीर ने 'संकल्प रथ' पत्रिका के दिसंबर (2012) अंक में कुछ लेख दिनेश सिंह की रचनाधर्मिता पर केंद्रित किये, तो वहीं रायबरेली के चर्चित कवि-आलोचक रमाकांत ने 'यदि' पत्रिका का 'दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक' सम्पादित कर 16 फरवरी 2013 को रायबरेली में इसका भव्य लोकार्पण भी करवाया। इस लोकार्पण समारोह में दिनेश सिंह की धर्मपत्नी, बेटी, दामाद, धेवता सहित रामनारायण रमण, ओम प्रकाश सिंह, शीतलदीन अवस्थी, आनन्द स्वरूप श्रीवास्तव, रमाकांत, ओम धीरज, जय चक्रवर्ती, वीरेश प्रताप सिंह, शमसुद्दीन अज़हर, अवनीश सिंह चौहान आदि लोग मौजूद थे। इस लोकार्पण समारोह में रमाकांत द्वारा कही गयी एक और बात यहाँ रखकर अपनी लेखनी को विराम देने की अनुमति चाहूँगा— "यद्यपि दिनेश सिंह ने गीत-नवगीत के क्षेत्र में ऐतिहासिक कार्य किया है, उनके अवदान का सम्यक मूल्यांकन अभी किया जाना शेष है।" 


  

(12)

चलो देखें 

 

चलो देखें—

खिड़कियों से झाँकती है धूप

उठ जाएँ।

सुबह की ताजी हवा में

हम नदी के साथ

थोड़ा घूम-फिर आएँ। 

 

चलो देखें—

रात-भर में ओस ने

किस तरह से

आत्म मोती-सा रचा होगा। 

फिर जरा-सी आहटों में

बिखर जाने पर,

दूब की उन फुनगियों पर

क्या बचा होगा?

 

चलो—

चलकर रास्ते में पड़े

अंधे कूप में पत्थर गिराएँ,

रोशनी न सही,

तो आवाज ही पैदा करें

कुछ तो जगाएँ। 

 

एक जंगल

अंधरे का—रोशनी का

हर सुबह के वास्ते जंगल।

कल जहाँ पर जल भरा था

अंधेरों में

धूप आने पर वहीं दलदल। 

 

चलो—

जंगल में कि दलदल में,

भटकती चीख को टेरें, बुलाएँ,

पाँव के नीचे,

खिसकती रेत को छेड़ें,

वहीं पगचिह्न अपने छोड़ आएँ।


सन्दर्भ:-

 

आस्तिक, वीरेन्द्र, "दिनेश सिंह और मैं : एक ऐतिहासिक दास्तान", संकल्प रथ, सितंबर 2012

 

——, धार पर हम, शाहदरा : आलोक पर्व प्रकाशन, 1998

 

कन्हैया लाल नंदन, श्रेष्ठ हिन्दी गीत संचयन, दिल्ली : साहित्य अकादमी, 2001

 

गौतम, सुरेश, काव्य परिदृश्य : अर्द्धशती (पुनर्मूल्यांकन) : खण्ड- 1 और 2, अल्मोडा : श्री अल्मोड़ा बुक डिपो, 1997

 

चौहान, अवनीश सिंह, "यदि पत्रिका का दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक लोकार्पित", पूर्वाभास : मंगलवार, 18 फ़रवरी 2014, वेब लिंक : http://www.poorvabhas.in/2014/02/blog-post_18.html

 

रमाकांत (सं), “दिनेश सिंह स्मृति विशेषांक”, 'यदि' (समय की साहित्यिक पत्रिका), मुराईबाग (डलमऊ), रायबरेली, वर्ष 11, अंक- 15, फरवरी 2014  

 

सिंह, शम्भुनाथ, नवगीत दशक- तीन, शाहदरा : पराग प्रकाशन, 1984 

 

सिंह, दिनेश, पूर्वाभास, इलाहाबाद : साहित्यालोचन प्रकाशन, 1975 (पृ 70)

 

सिंह, दिनेश (सं), 'नये-पुराने' : गीत अं

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