ISSN 2277 260X   

 

International Journal of

Higher Education and Research


 

 

Thursday, 12. April 2018 - 15:12 Uhr

कोसों दूर


rajanइधर रायबरेली के प्रतिष्ठित साहित्यकार परम श्रद्धेय राजेंद्र बहादुर सिंह 'राजन' जी की दो पुस्तकें डाक से प्राप्त हुईं- 'गीत हमारे सहचर' (गीत-नवगीत पर केंद्रित संग्रह) और 'ढाई आखर' (उपन्यास)। 10 जून 1954 ई. को जन्मे आदरणीय राजन जी की एक दर्जन से अधिक पुस्तकें प्रकाशित हो चुकी हैं, जिनमें 'भर्तृहरि' (खंड काव्य) 'हिमालय की पुकार' (काव्य कृति), 'चंदन विष' (उपन्यास) 'बादल के अलबेले रंग' (बाल गीत संग्रह), कदम्ब (हाइकु संग्रह), 'प्रायश्चित' (उपन्यास), कविता की तलाश (काव्य संग्रह), माटी की सौगंध (नाट्य संग्रह), मीरा (खंड काव्य), गुरुदेव की शरण में (संस्मरण), कवि और कविता (लक्षण ग्रंथ), गीत हमारे सहचर (गीत संग्रह), जिंदगी के रंग (गजल संग्रह), ढाई आखर (उपन्यास) प्रमुख हैं। गांव-जवार का यह मितभाषी, सहज, मिलनसार रचनाकार हिन्दी साहित्य को इतनी कृतियां देने के बाद भी साहित्य की मुख्यधारा/सोशल मीडिया आदि से कोसों दूर ही दिखाई पड़ता है। यह विडम्बना नहीं तो और क्या है। रचनाकार का पता- ग्राम फत्तेपुर, पोस्ट बेनीकामा, रायबरेली- 229402, मोबाइल- 860 155 102 2

 

अवनीश सिंह चौहान


 


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Thursday, 12. April 2018 - 15:10 Uhr

गीत गुनगुनाएं फिर से


हर्ष का विषय है कि युवा कवि, लेखक, सम्पादक राहुल शिवाय ने 'गुनगुनाएं गीत फिर से' शीर्षक से एक महत्वपूर्ण संकलन सम्पादित किया है। इस संकलन में 81 रचनाकारों को स्थान दिया गया है। इसमें मेरे भी दो गीत प्रकाशित हैं। प्रकाशक- कविता कोश, संस्करण- जनवरी 2018, पृष्ठ- 162, मूल्य- ₹220। पुस्तक प्राप्त करने के लिए इस नंबर पर संपर्क कर सकते हैं: 0829 5409 649

अवनीश सिंह चौहान


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Thursday, 12. April 2018 - 15:04 Uhr

टुकड़ा कागज़ का के बहाने


अवनीश सिंह चौहान का नवगीत संग्रह 'टुकड़ा कागज का' पढ़ते हुए मुझे श्रीप्रकाश मिश्र की बात याद आई, इसे पढ़कर लगा कि इसमें संग्रहीत जो गीत हैं वे समकालीन हिन्दी कविता के कथ्य और तथ्य से बहुत गहरे जुड़ते नजर आते हैं। इन गीतों में न तो कोरी भावुकता है न कोरी बौद्धिकता, जिस तरह निराला के बाद की कविता की चर्चा करते वक्त हम अज्ञेय, मुक्तिबोध, नागार्जुन, रघुवीर सहाय, शमशेर, धर्मवीर भारती, केदारनाथ सिंह, कुंवर नारायण, श्रीकांत वर्मा, धूमिल वगैरह का नाम धड़ाधड़ लेते जाते हैं वैसे गीतकारों की कोई श्रंखला नहीं बन पाती, किन्तु दिनेश सिंह, वीरेंद्र आस्तिक, बुद्धिनाथ मिश्र, कुँवर बेचैन, कैलाश गौतम, यश मालवीय, सुधांशु उपाध्याय आदि की एक अलग परम्परा जरूर दिखाई पड़ती है जिसने गीत-नवगीत को समकालीन कविता जैसी चुनौतियों के समकक्ष खुद को उभारा। … समकालीन हिन्दी नवगीत विधा में अवनीश सिंह चौहान का यह संग्रह और इसमें संग्रहीत गीत एक उपलब्धि और योगदान के रूप में जाने जायेंगे। 


- श्री रंग, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक, इलाहाबाद, उ. प्र.


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Thursday, 12. April 2018 - 15:01 Uhr

समकालीन गीत की भाषा - नचिकेता


वर्ष 1990 के बाद के गीतों ने समकालीन गीत रचना को एक नयी भाषा दी है जो पूर्ववर्ती गीत परम्परा से भिन्न है। वीरेंद्र आस्तिक, यश मालवीय, अवनीश सिंह चौहान आदि ने उपभोक्तावादी जिंसों तथा कम्प्यूटर के उपयोग में लाये जाने वाले तकनीकी शब्दों को इन गीतों के बिम्ब और प्रतीक के रूप में इस्तेमाल कर गीत-रचना की काव्य भाषा को अत्यधिक आधुनिक और समृद्ध बनाया है। 

- नचिकेता, वरिष्ठ कवि एवं आलोचक, पटना, बिहार
गीत वसुधा, पृष्ठ 51, 2013


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Tuesday, 10. April 2018 - 11:48 Uhr

अवनीश सिंह चौहान के एसोसियट प्रोफेसर न बनने पर खेद - डॉ पूर्णमल गौड़


डॉ अवनीश सिंह चौहान को डॉ पूर्णमल गौड़ की चिठ्ठी 


ab-singh---copy-1प्रिय अवनीश जी,
आप जैसे योग्य, सुशिक्षित, अनुभवी, उत्कृष्ट लेखक, शोधकर्मी, आदर्श शिक्षक, विश्वविद्यालय के गौरव को  बढाने में सदैव तत्पर, बेहद ईमानदार, छात्र हितैषी, बहुआयामी व्यक्तित्व, राष्ट्रीय-अन्तर्राष्ट्रीय सेमीनारों में सहभागिता व अध्यक्षता करने वाले प्राध्यापक को पदोन्नत कर एसोसियट प्रोफेसर बहुत पहले बना देना चाहिए था; अब तक नहीं बनाये जाने के लिए खेद है। मेरी अनन्त मंगल कामनाएं।

आपका,
डॉ पूर्णमल गौड़
सलाहकार, पंडित दीनदयाल उपाध्याय एवं डॉ मंगलसेन चेयर्स
महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय, रोहतक, हरियाणा

(डॉ पूर्णमल गौड़ महर्षि दयानन्द विश्वविद्यालय एवं एसआरएम विश्वविद्यालय, सोनीपत में हिन्दी विभागाध्यक्ष रह चुके हैं )

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