ISSN 2277 260X   

 

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Higher Education and Research


 

 

Friday, 17. November 2017 - 13:35 Uhr

पुस्तक समीक्षा : गीत अपने ही सुने का प्रेम-सौंदर्य - अवनीश सिंह चौहान


geet-apne-hi-suneहिन्दी साहित्य की सामूहिक अवधारणा पर यदि विचार किया जाए तो आज भी प्रेम-सौंदर्य-मूलक साहित्य का पलड़ा भारी दिखाई देगा; यद्यपि यह अलग तथ्य है कि समकालीन साहित्य में इसका स्थान नगण्य है। नगण्य इसलिए भी कि आज इस तरह का सृजन चलन में नहीं है, क्योंकि कुछ विद्वान नारी-सौंदर्य, प्रकृति-सौंदर्य, प्रेम की व्यंजना, अलौकिक प्रेम आदि को छायावाद की ही प्रवृत्तियाँ मानते हैं। हिन्दी साहित्य की इस धारणा को बहुत स्वस्थ नहीं कहा जा सकता। कारण यह कि जीवन और साहित्य दोनों अन्योन्याश्रित हैं, यही दोनों की इयत्ता भी है और इसीलिये ये दोनों जिस तत्व से सम्पूर्णता पाते हैं वह तत्व है- प्रेम-राग। 
 
इस दृष्टि से ख्यात गीतकवि और आलोचक वीरेन्द्र आस्तिक जी का सद्यः प्रकाशित गीत संग्रह ‘गीत अपने ही सुनें' एक महत्वपूर्ण कृति मानी जा सकती है। बेहतरीन शीर्षक गीत- "याद का सागर/ उमड़ आया कभी तो/ गीत अपने ही सुने" सहित इस कृति में कुल 58 रचनाएं हैं जो तीन खण्डों में हैं, यथा- 'गीत अपने ही सुनें', 'शब्द तप रहा है' तथा 'जीवन का करुणेश'। तीन खण्डों में जो सामान्य वस्तु है, वह है- प्रेम सौंदर्य। यह प्रेम सौंदर्य वाह्य तथा आन्तरिक दोनों स्तरों पर दृष्टिमान है। शारीरिक, मानसिक और बौद्धिक सौंदर्य का संतुलित समावेश कर सारभौमिक तत्व को उजागर करते हुए कवि संघर्ष और शान्ति (वार एन्ड पीस) जैसे महत्वपूर्ण उपकरणों से जीवन में आए संत्रास को खत्म करना चाहता है; क्योंकि तभी कलरव (प्रकृति) रूपी मूल्यवान प्रेम तक पहुँचा जा सकता है- "सामने तुम हो, तुम्हारा/ मौन पढ़ना आ गया/ आँधियों में एक खुशबू को/ ठहरना आ गया। देखिये तो, इस प्रकृति को/ सोलहो सिंगार है/ और सुनिये तो सही/ कैसा ललित उद्गार है/ शब्द जो
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व्यक्त था/ अभिव्यक्त करना आ गया। धान-खेतों की महक है/ दूर तक धरती हरी/ और इस पर्यावरण में/तिर रही है मधुकरी/ साथ को, संकोच तज/ संवाद करना आ गया। शांतिमय जीवन;/ कठिन संघर्ष है/ पर खास है/ मूल्य कलरव का बड़ा/ जब हर तरफ संत्रास है/ जिन्दगी की रिक्तता में/ अर्थ भरना आ गया।" 

veerendra-aastik-1आस्तिक जी का मानना है कि कवि की भावुकता ही वह वस्तु है जो उसकी कविता को आकार देती है; क्योंकि सौंदर्य न केवल वस्तु में होता है, बल्कि भावक की दृष्टि में भी होता है। कविवर बिहारी भी यही कहते हैं "समै-समै सुन्दर सबै रूप कुरूप न होय/मन की रूचि जैसी जितै, तित तेती रूचि होय।" शायद इसीलिये आस्तिक जी की यह मान्यता भाषा-भाव-बिम्ब आदि प्रकृति उपादानों के विशेष प्रयोगों द्वारा सृजित उनके गीतों को सर्वांग सुन्दर बना देती है। समाज, घर-परिवेश और दैन्य जीवन के शब्द-चित्रों से लबरेज उनके ये गीत प्रेम की मार्मिक अनुभूति कराने में सक्षम हैं- "दिनभर गूँथे/ शब्द,/ रिझाया/ एक अनूठे छंद को/ श्रम से थका/ सूर्य घर लौटा/ पथ अगोरती मिली जुन्हाई/ खूँद रहा खूँटे पर बछड़ा/ गइया ने हुंकार लगायी/ स्वस्थ सुबह के लिये/ चाँदनी/ कसती है अनुबंध को।" 
 
जीवन के अंतर्द्वंद्वों की कविताई करना इतना सरल भी नहीं है। उसके लिए कठिन तपश्यर्चा की आवश्यकता होती है। कवि यह सब जानता है- "गीत लिखे जीवन भर हमने/ जग को बेहतर करने के/ किन्तु प्रपंची जग ने हमको/ अनुभव दिये भटकने के/ भूलें, पल भर दुनियादारी/ देखें, प्रकृति छटायें/ पेड़ों से बतियायें।" इतना ही नहीं, कहीं-कहीं कवि की तीव्र उत्कंठा प्रेम को तत्व-रूप में देखने की होती है, तब वह इतिहास और शोध-संधानों आदि को भी खंगाल डालता है; तिस पर भी उसके सौंदर्य उपादान गत्यात्मक एवं लयात्मक बने रहते हैं और मन पर सीधा प्रभाव डालते हैं। कभी-कभी तो वह स्वयं के बनाए मील के पत्थरों को भी तोड़ डालता है, कुछ इस तरह- "मुझसे बने मील के पत्थर/ मुझसे ही टूट गए/ पिछली सारी यात्राओं के/ सहयात्री छूट गए/ अब तो अपने होने का/ जो राज पता चलता है/ उससे/ रोज सामना होता है"  और - "हूँ पका फल/ अब गिरा मैं तब गिरा/ मैं नहीं इतिहास वो जो/ जिन्दगी भर द्रोण झेले/ यश नहीं चाहा कभी जो/ दान में अंगुष्ठ ले ले/ शिष्य का शर प्रिय/जो सिर मेरे टिका।" 
 
निष्कर्ष रूप में कहना चाहता हूँ कि जीवन के शेषांश में समग्र जीवन को जीने वाले वीरेन्द्र आस्तिक जी की पुस्तक ‘गीत अपने ही सुने’ के गीत इस अर्थ में संप्रेषणीय ही नहीं, रमणीय भी हैं कि प्रेम-सौंदर्य के बिना जीवन के सभी उद्देश्य निरर्थक-सेे हो जाते हैं। विश्वास है कि सहृदयों के बीच यह पुस्तक अपना स्थान सुनिश्चित कर सकेगी।

पुस्तक : गीत अपने ही सुने                   
कवि : वीरेन्द्र आस्तिक
ISBN: 978-81-7844-305-8
प्रकाशक : के के पब्लिकेशन्स, 4806/24, भरतराम रोड, दरियागंज, नई दिल्ली-2        
प्रकाशन वर्ष : 2017, पृष्ठ : 128, मूल्य: रु 395/-
 

समीक्षक :
 
abnish-singh-chauhan-1युवा कवि, अनुवादक, सम्पादक डॉ अवनीश सिंह
​ चौहान
का जन्म 04 जून, 1979, चन्दपुरा (निहाल सिंह), इटावा (उत्तर प्रदेश) में हुआ। शिक्षा: अंग्रेज़ी में एम०ए०, बी०एड०, एम०फिल० एवं पीएच०डी०। 'शब्दायन' एवं 'गीत वसुधा' आदि समवेत संकलनों में आपके गीत और मेरी शाइन (आयरलेंड) द्वारा सम्पादित अंग्रेजी कविता संग्रह 'ए स्ट्रिंग ऑफ़ वर्ड्स' (2010) एवं डॉ चारुशील एवं डॉ बिनोद द्वारा सम्पादित अंग्रेजी कवियों का संकलन "एक्जाइल्ड अमंग नेटिव्स" में रचनाएं संकलित। आपकी आधा दर्जन से अधिक अंग्रेजी भाषा की पुस्तकें कई विश्वविद्यालयों में पढ़ी-पढाई जा रही हैं। आपका गीत संग्रह 'टुकड़ा कागज़ का' काफी चर्चित हुआ। आपने 'बुद्धिनाथ मिश्र की रचनाधर्मिता' पुस्तक का संपादन किया है। आप वेब पत्रिका पूर्वाभास के सम्पादक हैं। 'अंतर्राष्ट्रीय कविता कोश सम्मान', मिशीगन- अमेरिका से 'बुक ऑफ़ द ईयर अवार्ड', राष्ट्रीय समाचार पत्र 'राजस्थान पत्रिका' का 'सृजनात्मक साहित्य पुरस्कार', अभिव्यक्ति विश्वम् (अभिव्यक्ति एवं अनुभूति वेब पत्रिकाएं) का 'नवांकुर पुरस्कार', उत्तर प्रदेश हिन्दी संस्थान- लखनऊ का 'हरिवंशराय बच्चन युवा गीतकार सम्मान' आदि से अलंकृत।


Tags: गीत अपने ही सुने अवनीश सिंह चौहान Virendra Astik Abnish Singh Chauhan Book Review Hindi Literature Criticism वीरेन्द्र आस्तिक 

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Friday, 20. January 2017 - 11:49 Uhr

Creation and Criticism: Issue of Jan 2017


logo-cc-1The new Issue of Creation and Criticism (Issue 04, Jan 2017) is now live and can be viewed at www.creationandcriticism.com.
 
The issue besides the usual sections, has a special focus on: Indian Poetry in English reflecting a “rich collection” of interview, literary articles, research papers, book reviews and poems by as many as 24 poets from all over the country.
 
The interview section covers an interesting conversation with D C Chambial, an esteemed poet and editor, by Editor-in-Chief Dr Sudhir K Arora.
 
Under Literary Articles, renowned author Prof Satish Kumar, poet & critic Dr Shaleen Kumar Singh and Editor-in-Chief Dr Sudhir K Arora not only present the survey of Indian Poetry in English but also underline the contribution of 'young and old' poets of the Contemporary Indian English Poetry.
 
The next section contains 4 well-written research papers – Imagery in Shiv K Kumar’s Where have the Dead Gone? and Jayanta Mahapatra’s Hesitant Light by C L Khatri, Poetic Representations: Cultural Differences in Hindi and English Reading R. K. Singh’s Poetry Through Translation by Varsha Singh, A Study in Imagery of Swami Vivekananda’s Poetry by Vishesh Kumar Pandey and Indianness in Kamala Das’s ‘The Old Playhouse’ and ‘Composition’ by Mansha-Ashraf.
 
There are Reviews of 5 interesting books – Cultural and Philosophical Reflections in Indian Poetry in English in Five Volumes by Sudhir K Arora. (Reviewed by P C K Prem), For You To Decide by C L Khatri (Reviewed by Sandhya Saxena), Poetry Today by Pronab Kumar Majumder (Rev. by Madhubala Saxena), Songs of Love: A Celebration by P K Padhy
and Ashes and Embers by Madan G Gandhi (Rev. by Sudhir K Arora).
 
And please don’t miss the compulsive poetic delight in the following section- Poetry - with a tribute to Late Premananda Panda:
 
Aju Mukhopadhyay
Alka Agrawal
Archna Sahni
Bharati Nayak
Binod Mishra
C L Khatri
D C Chambial
Elsy Satheesan
Gopikrishnan Kottoor
I K Sharma
K V Raghupati
O P Arora
P C K Prem
P G Rama Rao
P K Panda
Pashupati Jha
R C Shukla
R K Bhushan
Rajiv Khandelwal
R K Singh
Susheel K Sharma
Syed Ali Hamid
Umashanker Yadav
Zafar Khan
 
Our forthcoming Issue (April 2017) also has equally promising features. Please visit the 'Call for Papers' page for details; your contributions are most welcome.
 
And let us reiterate our request: before sending your work please follow the guidelines given in ‘Submission.’ If you still have any question, you may please ask me or the editors concerned.
 
As ever, we do value your advices and responses. Please take some time off, on and off, to traverse the contents.
 
Warm wishes.
Abnish (Managing Editor)

Tags: e-journal Criticism Creation India Poetry 

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Tuesday, 18. October 2016 - 13:55 Uhr

Buddhinath Mishra Ki Rachnadharmita - Abnish Singh Chauhan


Book Details
Publisher:
Prakash Book Depot
Bara Bazar, Bareilly, U.P.-243003 
Phone: 0581-2572217
 
Title Buddhinath Mishra Ki Rachnadharmita
Author Abnish Singh Chauhan
Language Hindi
Year 2013
Binding PB
Pages 199p
ISBN 8179775004, 8179775004
Subject(s) Criticism
List Price 150.00


Tags: Dr Abnish Singh Hindi Literature Lyrics Criticism 

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Wednesday, 28. September 2016 - 16:19 Uhr

William Shakespeare : King Lear by Abnish Singh Chauhan

 

King Lear - A Critical Study Paperback – 2005 & 2016

by Abnish Singh Chauhan (Author)

Edition : First, 2005
Language: English
Pages: 608
Price: Rs. 180/-
Publisher: Bhavdiya Prakashan, Ayodhya, Faizabad, U.P.
Phone:+91-5278-232155,+91-5278-233155, +91-5278-243155. 
E-mail: bhavdiya@gmail.com

About the Book:
The book is designed with an Introduction to William Shakespeare and the play King Lear,complete Text with notes and paraphrases in English and Hindi, allusions and references, development and critical analysis of acts and scenes, important explanations, long, short and multiple objective type questions and their answers.

Tags: play drama critical study criticism Abnish Singh Chauhan Dr Abnish Singh 

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Wednesday, 28. September 2016 - 16:16 Uhr

Swami Vivekananda : Select Speeches by Abnish Singh Chauhan

 

Author: Abnish Singh Chauhan
ISBN 13: 9788179774663
ISBN 10: 817977466X
Publisher: Prakash Book Depot, Bara Bazar, Bareilly (U.P.)-243003, Phone: 0581- 2572217
Language: English
Binding: Paperback
Category: Literature, Religion and Philosophy


About the Book: 

Swami Vivekananda Select Speeches : Text Edited With Detailed Introduction, Critical Appraisal, Word-Meanings, Long and Objective Questions by Dr Abnish Singh Chauhan


Tags: Speeches Criticism Dr Abnish Singh Swami Vivekananda Abnish Singh Chauhan Dr Abnish Singh 

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